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कई बार पत्रकारों को नेताओं और आम जनता द्वारा की गई हिंसा का सामना करना पड़ा जो गंभीर चिंता का विषय है।
Author May 8, 2017 06:35 am
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस

हर वर्ष तीन मई को मनाया जाने वाला विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पत्रकारिता की मूलभूत आजादी के उत्सव के साथ ही उन पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का भी दिन होता है जिन्हें सिर्फ अपना कार्य निष्पक्षता से करने के कारण जान गंवानी पड़ी। स्वतंत्र, निष्पक्ष और निडर पत्रकारिता किसी भी देश के समग्र विकास लिए उतनी ही जरूरी है जितनी कि विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका जैसी संस्थाएं। लेकिन प्रश्न है कि बाजारवाद के वर्तमान युग में क्या वास्तव में पत्रकारिता निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप में विद्यमान है? अधिकतर मामले दर्ज न होने के बावजूद भारत में पिछले चौदह महीनों में पत्रकारों पर चौवन जानलेवा हमले दर्ज किए गए। गैरकानूनी खनन और निर्माण, कट्टरवाद, भ्रष्टाचार आदि विषयों पर कार्य करने वाले पत्रकार इन हमलों के ज्यादा शिकार हुए हैं। कई बार पत्रकारों को नेताओं और आम जनता द्वारा की गई हिंसा का सामना करना पड़ा जो गंभीर चिंता का विषय है। बात सिर्फ हमलों तक सीमित नहीं है, कई बार प्रशासन और सरकारें भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं। पठानकोट हमले की खबर चलाए जाने पर एक टीवी चैनल पर लगाया गया प्रतिबंध इसका उदाहरण है। यह अलग बात है कि सर्वोच्च न्यालालय ने इस प्रतिबंध पर रोक लगा दी थी। सरकारों का इंटरनेट सेवाएं बाधित करना भी नया नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय प्रेस निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी की गई 2017 की सूची के अनुसार भारत अब 2016 की तुलना में तीन स्थान पिछड़ कर एक सौ छत्तीसवें स्थान पर आ गया है। अफगानिस्तान और फिलस्तीन जैसे देश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। यह रैंकिंग पत्रकारिता के लिए आवश्यक स्वतंत्रता और भयमुक्त वातावरण को दर्शाती है जिसमें भारत का प्रदर्शन निराशाजनक है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए अभी देश में बहुत प्रयास किए जाने की जरूरत है जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं। सरकार की आलोचना को आदर्श मानने वाली पत्रकारिता की जगह अब सरकार की चापलूसी ने ले ली है। आजकल कई मीडिया संस्थान सांप्रदायिक और कट्टरवादी विचारों को प्राथमिकता से दिखाते नजर आते हैं। एक दूसरे से आगे बढ़ने की दौड़ में सब खुद को ज्यादा कट्टर साबित करने में लगे हैं। इसके उलट पत्रकारिता का फर्ज बनता है कि सभी संबंधित पक्षों का नजरिया सामने रख बातचीत से किसी भी मसले का हल निकालने की वकालत करे। कमजोर का पक्ष लेने की आदर्श परंपरा का अंत होने से किसानों, मजदूरों और अन्य वंचित-प्रताड़ित तबकों की आवाज अब किसी अखबार की सुर्खियां नहीं बनती। सूखा, बाढ़ और अकाल से पीड़ित नागरिक मीडिया के लिए अब जरूरी नहीं रहे क्योंकि इनकी खबरों से मुनाफा नहीं आता। अब मीडिया केवल वही खबरें दिखाता है जो बिकती हैं या जिनसे व्यावसायिक अथवा निजी हित सधते हैं। बाजारवाद के सिद्धांतों का पालन करते हुए व्यावसायिक घरानों ने मीडिया को भी बिकाऊ माल बना कर पत्रकारिता का जो अवमूल्यन किया है उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा। पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा जब स्वयं एक बहुत बड़ा खतरा बन जाए तो कल्पना करना मुश्किल नहीं कि अन्य मुश्किल हालातों में उसकी भूमिका क्या रहेगी।

’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तम नगर, नई दिल्ली

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