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किसान का दर्द

किसान भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन पिछले छियासठ वर्षों से सुन और देख रहा हूं कि हम किसान के लिए ये करेंगे, वह करेंगे।
Author June 26, 2017 06:07 am
किसानों की कर्मभूमि रहा पंजाब आज उनकी मरनभूमि बन रहा है।

किसान का दर्द
यों आज तक देश की सभी सरकारें किसान और मजदूरी की बातें करती रही हैं, लेकिन वास्तव में उनका हमदर्द कोई नहीं है। इस संदर्भ में एक प्रचलित कहावत है- ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो क्या खाएगा।’ यह कहावत हमारी सरकारों की किसानों के प्रति सोच उजागर करने के लिए पर्याप्त है। मेरी नजर एक खबर पर पड़ी कि कर्नाटक में प्रति किसान पचास हजार रुपए कर्ज माफ किया जाएगा। जैसा कि हमारे नेता अपने मन से घोषित कर चुके हैं। कर्ज माफी किसान की आर्थिक स्थिति स्थायी रूप से सुधारने का कोई उपाय नहीं है। अगर वास्तव में हमारी वर्तमान सरकार किसानोें का उपकार करना ही चाहती है तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू क्यों नहीं कर देती? लेकिन ईमानदारी से किसान का कोई हितैषी नहीं।

जबकि किसान भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। लेकिन पिछले छियासठ वर्षों से सुन और देख रहा हूं कि हम किसान के लिए ये करेंगे, वह करेंगे। मगर आज तक हुआ कुछ नहीं। जो हुआ है वह यह है कि मेरी याद में बहुत सारे किसान भूख से पीड़ित होकर गांव से अपनी जमीन बेच कर दिल्ली जाकर बस गए। आज वे खुशहाल हैं। असलियत नीचे लिखी कुछ पंक्तियों से साफ हो जाती है। दिवंगत सुंदर लाल शर्मा रचित एक कविता का छोटा-सा हिस्सा उसकी पत्नी का दर्द बयान करता है, जिसमें किसान की गाथा आ जाती है- ‘मैं धरती का लाल मगर/ ये मुझको रास ना आई हैं/ मैं जगती को मीठा करता/ मुझको नहीं मिठाई हैं/ मेहनत ने संवला दी गोरी/ उसकी कमल पंखुरी नासिका पर/ एक मोती नहंी जड़ा पाया/ करते ही फसल मुझे हो/ नंगे हाथ दिखाती हैं/ मैं आगे-आगे कहता हूँ/ जीवन फसली कट जाती हैं/ वो बीज चिता जल जाती हैं/ मेरी कलियां यूं जलती हैं/ फूलों को कहां रसाई हैं/ मैं जगती को मीठा करता/ मुझको नहीं मिठाई हैं।’
’सुरेंद्र शर्मा, बागपत

सौहार्द का खेल
हार-जीत खेल का अटूट हिस्सा है। खेल पल-पल रोमांच और सिहरन पैदा करता है। यह खेल ही है जो सही मायने में भाईचारे, सौहार्द, दोस्ती और प्यार की भावना को बढ़ावा देता है। उन्माद हर्ष और विषाद दोनों का मिला-जुला रूप है। हार-जीत पर उन्माद का प्रकट होना स्वाभाविक है। लेकिन भारत-पाक मैच में हार या जीत पर यह उन्माद अपनी सीमा को भी लांघ जाता है। तब यह खुशी या गम के बजाय आपसी कटुता का संकेत देता है, जिससे खेल भावना आहत होती है। हम हार-जीत में वह सब जोड़ लेते हैं, जिसका खेल से कोई नाता ही नहीं है। दोनों मुल्कों के देशवासियों को समझना चाहिए कि महज एक हार या जीत पर इतना भावनात्मक उफान मचाना ठीक नहीं। खेल के मैदान के बाहर और भीतर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का आगाज तभी होगा।
’नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर

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