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चौपाल: पलायन की पीड़ा

यह नहीं जान पाए कि जो शिक्षा वे अपने बच्चों को दे रहे हैं, वह उन्हें पलायन के लिए प्रेरित करेगी और वह मैदानोन्मुखी है।
Author November 14, 2016 03:02 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में गांवों के वीरान अथवा खंडहरों में तब्दील हुए मकानों की फोटो फेसबुक पर अथवा कहीं अन्यत्र देखने से लगता है कि बीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर सातवें दशक के बीच जिन पर्वतीय लोगों ने अपने गांवों में बेहतर मकान बनाए थे, उन्हीं के बच्चों ने उन गांवों से सबसे पहले पलायन किया। जिनके पास अच्छे घर बनाने के लिए पैसा था, उन्होंने उसे अपने बच्चों की शिक्षा पर भी खर्च किया। स्थानीय लोग खुश होते रहे कि उत्तराखंड के बच्चे काबिल हो रहे हैं लेकिन वे यह नहीं जान पाए कि जो शिक्षा वे अपने बच्चों को दे रहे हैं, वह उन्हें पलायन के लिए प्रेरित करेगी और वह मैदानोन्मुखी है। ‘डिग्री लेकर तू यहां गांव में क्या कर रहा है?’ यह सवाल न जाने कितने लोगों ने अपने गांवों के बच्चों से किया होगा। खैर, अब स्थिति यह है कि उसी पलायन पर सेमीनार हो रहे हैं। जो पलायन कभी प्रगति का सूचक माना जाता था, वह अब सभी संबंधित लोगों को पीड़ा पहुंचा रहा है।

उत्तराखंड की वर्तमान तस्वीर को देख कर यही कह सकते हैं, ‘सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया, दिन में अगर चराग जलाए तो क्या किया।’ दरअसल, हम सभी भारत के लोग मैकाले की उस शिक्षा पद्धति के उत्पाद हैं जो हमें अनपढ़ और गरीब मां-बाप से दूर ले जाती है; साधन विहीन गांवों को साधन संपन्न बनाने के लिए उपाय खोजने और संघर्ष करने के बजाय वहां से भागने के लिए प्रेरित करती है और केवल ‘खुद के विकास’ के मोह में उलझा देती है।

दरअसल, उत्तराखंड से होने वाला पलायन उस आवागमन से भिन्न है जिससे पूरी दुनिया सरोकार रखती है। अगर पलायन से गांव उजड़ते नहीं तो फिर ऐसे पलायन से दुखी होने की जरूरत नहीं। सभी लोग एक ही जगह बने रहें, यह न संभव है और न उचित लेकिन सभी लोग गांव छोड़ कर चले जाएं और उसे वीरान बना दें, यह राष्ट्र-हित में भी नहीं है। उत्तराखंड देश का सीमांत प्रदेश है और इसकी बसावट राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से बेहद जरूरी है। यहां से होने वाले पलायन का बोझ हमारे महानगरों और नगरों पर भी पड़ा है। विदेशों में पलायन सीधे गांवों से नहीं हुआ है। वह तो मुख्यतया महानगरों और नगरों से हुआ है लेकिन उससे हमारे महानगरों-नगरों की आबादी में कोई फर्क नहीं पड़ा है और न उनके वीरान होने की कोई संभावना है। देश की सरकारों को विकास की ऐसी नीति तैयार करनी होगी जिससे कोई भी इलाका वीराने में तब्दील न हो।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

 

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