ताज़ा खबर
 

चौपाल- समाधान का रास्ता

जब हम भारत में गरीबी की समस्या को खत्म करने की बात करते हैं, तब सामाजिक योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराया जाता है।
Author October 11, 2017 05:23 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

समाधान का रास्ता
अक्सर यह देखा जाता है कि अलग-अलग सार्वजनिक कार्य के माध्यम से ऊपरी समस्या को केंद्र में रख कर काम किया जाता है। जैसे जब हम भारत में गरीबी की समस्या को खत्म करने की बात करते हैं, तब सामाजिक योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराया जाता है। जब ग्रामीण रोजगार की समस्या देश के सामने आती है तो मनरेगा जैसी सामाजिक योजनाएं चलाई जाती हैं। अंत में जब कुपोषण मुक्त भारत बनाने की बात होती है तो खाद्य सुरक्षा जैसी व्यापक योजना चलाई जाती है। इस तरह की सामाजिक कल्याण की योजनाओं से हम समस्या का तात्कालिक समाधान तो निकाल पाते हैं, लेकिन कई तरह के और भी दीर्घकालिक समस्याओं को उत्पन्न कर देते हैं, जो आगे चल कर विस्फोटक साबित होता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आखिरकार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समस्या के तात्कालिक समाधान पर पूरी तरह निर्भरता घातक हो सकती है। इसलिए किसी समस्या के बुनियादी वजहें तलाश करते हुए उस पर जब हम काम करते हैं, तब उसका स्थायी समाधान निकल पाता है। जैसे भारत के परिप्रेक्ष्य में पलायन, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, स्वास्थ्य ढांचे का खस्ताहाल, किसानों द्वारा आत्महत्या, शहरी स्लम की बढ़ती संख्या जैसी समस्याएं लगातार स्थिति को गंभीर बना रही हैं। इससे निपटने के लिए किसान कर्ज माफी, शहरी आवास निर्माण, अन्य सामाजिक कल्याण की योजनाएं सिर्फ तात्कालिक समाधान कर सकती हैं, न कि स्थायी।

यहां सार्वजनिक कार्य के तहत जरूरी है कि इस तरह की समस्याओं के ढांचागत सुधार पर ध्यान दिया जाए। इसके तहत भारत में लगभग साठ फीसद आबादी की निर्भरता कृषि पर है। साथ में यहां की सत्तर फीसद आबादी ग्रामीण पृष्ठभूमि से है। ऐसे में हम लोग जैसे ही ग्रामीण अर्थतंत्र को मजबूत करने के लिए पहल करते हैं, उसमें कृषि तंत्र का सुधार प्राथमिक हो जाता है। हम लोग जानते हैं कि भारत में मानव संसाधन की कोई कमी नहीं है और यह काफी निर्णायक है। यहां के ज्यादातर किसान छोटे भूखंडों पर निर्भर हैं। ऐसे में परंपरागत अनाज की उपज से उसकी जरूरतों की भरपाई नहीं हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि कृषि का ऐसा मॉडल उपलब्ध हो, जिसमें रोजगार सृजन के साथ यह कार्य लाभकारी उद्यम में तब्दील हो सके। तभी हम इस तरह की सभी समस्याओं का समाधान कर पाएंगे जो अंतिम तौर पर सार्वजनिक कार्यों के उद्देश्यों को सफल बना पाएगी।
’सुमित कुमार, रीगा, सीतामढ़ी

ढलान पर अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कंपनी सचिवों को संबोधित करते हुए कहा कि यूपीए सरकार में आठ बार जीडीपी 5.7 प्रतिशत पर आ गई थी, हमारी तीन साल की सरकार में तो पहली बार ऐसा हुआ है। उनके इस रक्षात्मक बयान से साफ परिलक्षित होता है कि अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के कारण एक डर उनके अंदर बैठ गया है। मोदी जी ने यूपीए-2 सरकार के उन तीन वर्षों से अपने प्रधानमंत्रित्व काल की तुलना की है जो अर्थव्यवस्था के लिहाज से बहुत ही खराब थे। वरना यूपीए सरकार के समय देश की जीडीपी 12 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

जब कोई चुनावी प्रत्याशी चुनाव के समय सरकार की गलत नीतियों और अर्थव्यवस्था पर पड़े नकारात्मक प्रभाव की निंदा करता है, तब अच्छा लगता है। लेकिन जब वही प्रत्याशी प्रधानमंत्री बन कर पिछली सरकार से अपनी सरकार की तुलना करता है, यह देश के विकास लिए शुभ संकेत नहीं है। नोटबंदी और फिर उसके बाद जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था में आई मंदी के चलते देश में लाखों लोगों के जीवनयापन का जरिया खत्म हुआ है, बेरोजगारी बढ़ी है। इस बात को देश के ही नहीं, बल्कि विदेशों के भी अर्थशास्त्री अब मानने लगे हैं।
’ऋषिकांत, इटावा, उत्तर प्रदेश

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग