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दहेज के खिलाफ

दहेज जैसी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे खत्म नहीं किया जा सकता। इसेरोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए।
Author July 17, 2017 03:55 am
दहेज मांगने वालों का नहीं पढ़ा जाएगा निकाह

दहेज के खिलाफ
दहेज जैसी सामाजिक बुराई को केवल कानून के भरोसे खत्म नहीं किया जा सकता। इसेरोकने के लिए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया जाना चाहिए। विवाह अपनी ही जाति में करने की जो परंपरा है उसे तोड़ना होगा और अंतरराज्यीय विवाहों को प्रोत्साहन देना होगा; तभी दहेज लेने के मौके घटेंगे और विवाह का क्षेत्र व्यापक बनेगा। मां-बाप चाहते हैं कि बेटे को पढ़ाने-लिखाने और उसे लायक बनाने के लिए उन्होंने जो कुछ खर्च किया है, वह उसका विवाह करके वसूल कर लेना चाहिए। इंजीनियर, डॉक्टर अथवा आइएएस लड़कों का दहेज पचास लाख से एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। एक सामान्य गृहस्थ इतना खर्च कैसे उठा सकता है! वर्तमान परिस्थितियों में उचित यही है कि ऐसे सभी लोग एक मंच पर आएं जो दहेज को मन से निकृष्ट और त्याज्य समझते हों। वे स्वयं दहेज न लें और दहेज लेने वालों के खिलाफ आवाज उठाएं। कुछ साल तक यदि पूरे देश में दहेज विरोधी आंदोलन चलाया जाए तो इस कुप्रथा को मिटाना संभव हो पाएगा।
’संतोष कुमार, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा
बढ़ता अवसाद
आजकल प्रतिस्पर्धा के दौर में हर कोई सबसे आगे निकलना चाहता है। इस दौड़ में सबको अपनी मंजिल जल्दी चाहिए। इस कारण जरूरत से ज्यादा चिंता होना लाजमी है। ज्यादा चिंता तनाव को बढ़ाती है और तनाव बढ़ने से इंसान अवसाद का शिकार हो जाता है। खुद को भीड़ में अकेला पाना, ज्यादा चिंता और तनावग्रस्त रहना, हारा हुआ महसूस करना, किसी से मन की बात बात न कह पाना पाना, ये सब अवसाद के लक्षण हैं। इससे निपटने में आसपास के लोगों की भूमिका बेहद अहम होती है क्योंकि अवसाद से ग्रस्त इंसान अलग-थलग, चुपचाप और हर समय तनावग्रस्त नजर आता है। ऐसे में आसपास के लोगों को उसकी मदद के लिए आगे आना चाहिए। एक महामारी की तरह फैलते अवसाद रोग के खात्मे के लिए हर इंसान को एक छोटा-सा प्रण लेना होगा कि अगर कोई व्यक्ति अवसाद से पीड़ित नजर आए तो खुल कर उसकी समस्या जानें और उससे दोस्ताना व्यवहार करें।
’शालिनी नेगी, जैतपुर, बदरपुर, नई दिल्लीे

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