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बदलाव का परदा

एक बार फिर आम आदमी छला गया। कितने वादे किए गए थे कि नोटबंदी से खूब पैसा आया है, अब कर्ज सस्ता होगा।
Author December 13, 2016 03:28 am
मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को एक महीना हो चुका है। लेकिन अभी तक बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें कम नहीं हुई है। (Photo:PTI)

एक बार फिर आम आदमी छला गया। कितने वादे किए गए थे कि नोटबंदी से खूब पैसा आया है, अब कर्ज सस्ता होगा। लेकिन मौद्रिक नीति समिति समीक्षा ने सब अरमानों पर पानी फेर दिया। सारे केंद्रीय मंत्री, ग्यारह बैंक प्रमुख और साठ से ज्यादा अर्थशास्त्रियों ने दावा किया था कि ऋण सस्ते हो जाएंगे। सबकी उम्मीदों के उलट, रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने न सिर्फ रेपो दर 6.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी, बल्कि विकास दर का अनुमान भी 0.5 प्रतिशत कम कर दिया है। तीन प्रमुख तर्क प्रस्तुत किए गए। पहला, नोटबंदी से उद्योग सुस्त पड़ चुके हैं, कंपनियां वेतन तक नहीं दे पा रही हैं। दूसरा, अभी भी महंगाई 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जहां इसका लक्ष्य 4 प्रतिशत रखा गया है। अधिक पैसा बाजार में आने पर तरलता बढ़ जाएगी। सातवें वेतन आयोग से मिले एरियर के असर का आकलन भी अभी होना शेष है। तीसरा, अमेरिका फेडरल रिजर्व की ब्याज दर वृद्धि की संभावना है, जिस कारण विदेशी निवेश भारत से पैसे निकाल सकते हैं। कारण ठीक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन तीनों कारणों का पूर्वाभास पहले से नहीं था? क्या नोटबंदी के प्रभावों का उचित आकलन नहीं किया जा सका था?

बाईस दिनों में बारह बार अधिसूचनाएं बदलना किस ओर संकेत देता है? मेट्रो शहरों में भी रुपयों की भारी किल्लत और ग्रामीण इलाकों में सब कुछ उधारी पर लाने का सिलसिला बढ़-सा गया है। नोटबंदी से 14.5 लाख करोड़ रुपए मूल्य के नोट चलन से बाहर हो चुके थे और अब तक करीब पचासी प्रतिशत यानी बारह लाख करोड़ रुपए से ज्यादा बैंकों में जमा हो चुके हैं। तो क्या सिस्टम में कालाधन नहीं था या फिर कालेधन को बैंकिंग व्यवस्था में डालने के नए रास्ते निकाल लिए गए हैं?जो भी हुआ, क्या खेत में मजदूरी करने वाले गरीब को परेशानियों के अतिरिक्त कुछ प्राप्त हुआ? क्या अस्पताल में जिंदगी-मौत के बीच जूझ रहे मरीज के लिए नोटबंदी एक जहर का कार्य नहीं करेगी? फिर अंत में, इससे न तो ब्याज दर में कमी ही आई और जब तक भ्रष्टाचार जीवित है, कालाधन समाप्त किया नहीं जा सकता। तो क्या यह मात्र एक चुनावी खेल भर था या फिर वास्तव में एक विफल योजना थी?
’वीरेश्वर तोमर, हरिद्वार

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