December 06, 2016

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चौपाल: सुधार की दरकार

नोटबंदी के बाद बेनामी संपत्ति पर संभावित हमले की सरकारी मंशा के बाद देश में एक बार फिर से चुनाव सुधारों की आहट भी महसूस की जा रही है।

Author November 29, 2016 05:44 am
500 और 1000 के नोट की तस्वीर का इस्तेमाल प्रतिकात्मक तौर पर किया गया है।

नोटबंदी के बाद बेनामी संपत्ति पर संभावित हमले की सरकारी मंशा के बाद देश में एक बार फिर से चुनाव सुधारों की आहट भी महसूस की जा रही है। भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश में एक समय में सारे चुनाव करा लेना एक बड़ा कठिन कार्य है लेकिन यह असंभव भी नहीं है। चुनाव सुधारों में कुछ और चीजों को जोड़ना जरूरी होगा। जैसे अमेरिका की तर्ज पर लोकसभा के बचे कार्यकाल के दो-तीन महीने पहले ही चुनाव करा लिए जाएं ताकि भावी प्रधानमंत्री इन महीनों में अपने देश के दूर-दराज के इलाकों में घूम कर वस्तुस्थिति को करीब से देख सके। किसी सांसद को जो मंत्री न हों, राजधानी में आवास न दिया जाए।

इसके बजाय उनके रहने के लिए एमपी हॉस्टल जैसा कुछ बनाया जाए। मतदान के लिए 18 वर्ष और सांसद-विधायक बनने के लिए जरूरी पच्चीस वर्ष की आयु सीमा खत्म हो। निजी स्टाफ की नियुक्ति के लिए जो भत्ते सरकार जनप्रतिनिधियों को देती है उनका उपयोग वे अक्सर अपने फायदे के लिए करते हैं। ऐसे में क्यों न एक सेवा का गठन कर दिया जाए जो सांसदों-विधायकों के विधायी कार्यों में मदद करने वाले कुशल लोगों का चयन कर सके। चुनावी खर्च राज्य वहन करे और प्रत्येक उम्मीदवार को एकसमान प्रचार तंत्र दिया जाए। ऐसे तमाम सुझाव हैं जिन्हें चुनाव सुधारों में जोड़ा जाना जरूरी है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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First Published on November 29, 2016 5:44 am

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