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करे कौन भरे कौन

किसी को भी यह समझने के लिए अर्थशास्त्र के विशेष ज्ञान की जरूरत नहीं है कि यह फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लघु उद्योगों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है।
Author December 22, 2016 04:14 am
मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को एक महीना हो चुका है। लेकिन अभी तक बैंकों और एटीएम के बाहर लाइनें कम नहीं हुई है। (Photo:PTI)

एक विकासशील अर्थव्यवस्था में छियासी प्रतिशत मूल्य के नोट रातोरात बाजार से बाहर कर दिया गया, जहां नब्बे प्रतिशत से ज्यादा लेन-देन नकदी में होता है और लगभग चालीस प्रतिशत आबादी का किसी बैंक में कोई खाता नहीं है और यह सारी मशक्कत उस दो प्रतिशत काले धन को खत्म करने के लिए, जो बड़े नोटों में दबा है। किसी को भी यह समझने के लिए अर्थशास्त्र के विशेष ज्ञान की जरूरत नहीं है कि यह फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लघु उद्योगों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है। आज हम मध्यमवर्गीय लोग भी बाहर खाना खाने के लिए ठेले वाले को नहीं, बड़े रेस्तरां ढ़ूंढ़ते हैं जहां नकदी से भुगतान का झंझट न हो। राशन के सामान से लेकर जरूरत की हर वस्तु खरीदने के लिए छोटे दुकानदारों को नहीं, बल्कि बड़े शॉपिंग मॉल जाने को मजबूर हैं, भले ही वहां पैसे ज्यादा देने पड़े। समझ जा सकता है कि इस फैसले से किसका फायदा हो रहा है और किसका नुकसान। ग्राहक के व्यवहार में यह परिवर्तन अन्य विकल्पों को खत्म करके जबर्दस्ती थोपा जा रहा है।

आम आदमी घंटो बैंक की लाइन में लगने को मजबूर है। बैंक में बचत खाता का मतलब ही यह होता है कि मांगे जाने पर ग्राहक को भुगतान किया जाएगा। फिर बचत खाते से आहरण की सीमा निर्धारित करना क्या ग्राहक और बैंक के मध्य करार का उल्लंघन नहीं है? वह भी कितना मिल पा रहा है? इस आधार पर बैंकों की तरफ से सरकार को सभी जमाधारकों को हर्जाना भरना चाहिए, ठीक उसी प्रकार जैसे बैंक आपके खाते में न्यूनतम राशि न होने पर शुल्क वसूलते हैं।हाल ही में लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति पर ढीले रवैए को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लताड़ लगाते हुए भ्रष्टचार के खिलाफ सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे। वैसे भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की गंभीरता पर जो थोड़ा बहुत संदेह था, वह तब दूर हो गया जब सभी राजनीतिक दलों के खातों में बिना किसी जांच के पुराने नोट जमा करने की छूट दे दी गई। जाहिर है, हम्माम में सब नंगे हैं और आरोप-प्रत्यारोप का यह ढोंग सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने के लिए है।

बेहतर होता की सरकार उस अठानबे फीसद काले धन पर हमला करती जो सोना के रूप में और रियल एस्टेट और विदेशी बैंकों में जमा है। पर शायद उससे उन बड़ी मछलियों को समस्या होती जो या तो सरकार चला रहे हैं या सरकार चलाने वालों को। वैसे भी नोटबंदी सिर्फ काले धन के भंडार पर हमला करता है, उसके प्रवाह पर नहीं। यानी इससे भविष्य में होने वाले भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आएगी। असल में समस्या बड़े नोटों की नहीं, चरित्र और नैतिक मूल्यों की है, जिनका हमारे देश में नितांत अभाव है।
’अनिल हासानी, भोपाल

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