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लक्ष्य से दूर

भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया कि अब तक 11.35 लाख करोड़ रुपए कीमत के पुराने विमुद्रीकृत नोट बैंकों में जमा हो चुके हैं।
Author December 12, 2016 02:32 am
पुराना पांच सौ का नोट।

सात दिसंबर को भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया कि अब तक 11.35 लाख करोड़ रुपए कीमत के पुराने विमुद्रीकृत नोट बैंकों में जमा हो चुके हैं। इससे पता चलता है कि सरकार ने जो चार लाख करोड़ रुपए वापस न आने का अनुमान लगाया था, वह अतिशयोक्तिपूर्ण था। यह 1978 तो है नहीं कि एक हजार रुपए के नोट से तोला भर सोना मिल जाए! आज के समय में मुद्रा की कीमत उस स्तर तक घट चुकी है कि एक गरीब के पास भी पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट सहज ही उपलब्ध होते हैं। क्या सरकार नोटबंदी के निर्णय से पहले इस जमीनी हकीकत से दूर थी? नहीं, हार्वर्ड और कैंब्रिज में पढ़े हुए अर्थशास्त्री मुद्रा की स्थिति से अनभिज्ञ नहीं हो सकते। असल बात यह थी कि बढ़ते हुए ‘एनपीए’ के कारण बैंकिंग व्यवस्था में मंदी आ गई थी। बैंकों के पास सुचारु रूप से काम करने के लिए न्यूनतम 1.80 लाख करोड़ रुपए भी उपलब्ध नहीं थे। बैंकों की मंदी दूर करने के लिए बजट में सत्तर हजार करोड़ का प्रावधान भी किया गया था, लेकिन यह पर्याप्त साबित नहीं हुआ।

ऐसे में बैंकों की मंदी दूर करने का केवल एक तरीका था- जनता के पास मौजूद नकदी को बैंकों में ढेर के रूप में जमा करना। वरना ऐसी भी क्या छह महीनों की तैयारी थी, जिसमें सरकार ने पर्याप्त नोट नहीं छापे हों! नए नोट पर्याप्त मात्रा में इसलिए नहीं छापे गए कि इसका हवाला देकर बैंकों से पैसों की निकासी की सीमा तय की जा सके। और इसीलिए पुराने नोटों को एक ही झटके में अवैध घोषित कर दिया गया, ताकि लोग हड़बड़ी के माहौल में अपना पैसा तुरंत जमा करने को बैंकों की तरफ भागें; सैलाब में ढेर सारी पूंजी बैंकों में जमा हो जाने से उनकी मंदी, जो कि बड़े पूंजीपतियों द्वारा कर्ज वापस न लौटाने के कारण आई थी, तुरंत समाप्त हो जाए। वरना पुराने नोट चलते रहने देने से इस प्रक्रिया पर कोई असर तो पड़ता नहीं!  काला धन, आतंकवाद और नकली नोट केवल जुमले थे। सरकार सीधे-सीधे जनता से यह आग्रह नहीं कर सकती थी कि बैंकों की मंदी दूर करने के लिए आप सब कतारों में लग कर अपना पैसा जमा कर दीजिए। इसलिए नोटबंदी के फैसले को देशभक्ति की चाशनी में डुबो कर पेश किया गया।

अब जब बैंकों की मंदी दूर होने लगी है और थोड़े से भी काले धन के बाहर आने की संभावनाएं खत्म हो गई हैं, तब सरकार नोटबंदी के लक्ष्य को काले धन से नकदी-विहीन अर्थव्यवस्था की तरफ धकेलने लगी है। नकदी विहीन अर्थव्यवस्था का यह नया लक्ष्य सरकार ने नए नोटों की कमी और उससे फैली अव्यवस्था को आमजनों की चेतना मिटाने के उद्देश्य से मजबूरन तय किया है, क्योंकि नकदी-विहीन अर्थव्यवस्था के क्रियान्वयन के लिए भारत में आधारभूत संरचना लगभग नगण्य है।नकदी-विहीन अर्थव्यवस्था के इस नए लक्ष्य के भविष्य में गायब हो जाने की पूरी संभावनाएं हैं। नहीं तो सरकार ने कम से कम अपनी छह महीनों की तैयारी के दौरान ‘कार्ड स्वाइप’ करने वाली ‘पीओएस’ मशीनों का तो पर्याप्त निर्माण कर ही लिया होता, अगर वह सच में नकदी विहीन अर्थव्यवस्था को लेकर पहले से गंभीर होती।
’मुरारी त्रिपाठी, कानपुर

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