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बदलाव की उम्मीद

आमतौर पर न्यायिक व्यवस्था में फैसला आने में 10-15 साल का समय भी लग जाता है। ऐसे में फैसला आने तक दागदार छवि वाले नेता अपने तीन-चार कार्यकाल पूरे कर लेते हैं और राजनीति का अपराधीकरण रोकना मुश्किल हो जाता है।
Author November 7, 2017 05:05 am
आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव (PTI Photo)

बदलाव की उम्मीद

राजनेताओं से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत के गठन की वकालत की है। कोर्ट ने इस कदम को राष्ट्रहित में बताते हुए इसमें लगने वाले समय व धन के संबंध में सरकार से छह हफ्ते में जवाब मांगा है। अगर विशेष अदालत में राजनेताओं से जुड़े आपराधिक मामलों का तीव्र निपटारा होता है तो इससे राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया शिथिल हो सकती है। 2014 के चुनावी हलफनामों के अनुसार देश के 1581 सांसदों-विधायकों पर मामले दर्ज हैं जो बहुत बड़ी संख्या है। इतनी अधिक संख्या में आपराधिक प्रष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों का होना भारतीय राजनीति पर दाग और स्वच्छ राजनीतिक संस्कृति के निर्माण की राह में रोड़ा है।

आमतौर पर न्यायिक व्यवस्था में फैसला आने में 10-15 साल का समय भी लग जाता है। ऐसे में फैसला आने तक दागदार छवि वाले नेता अपने तीन-चार कार्यकाल पूरे कर लेते हैं और राजनीति का अपराधीकरण रोकना मुश्किल हो जाता है। अगर विशेष अदालत की स्थापना के बाद आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं के मामलों का निपटारा एक साल के अंदर हो जाता है और दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगता है (जैसा कि चुनाव आयोग ने सुझाया है) तो राजनीति के अपराधीकरण को काफी हद तक रोका जा सकता है।इस तरह की व्यवस्था से राजनीति में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इससे राजनीति से न सिर्फ अपराधों में लिप्त नेता दूर रहेंगे बल्कि अच्छे व बेदाग छवि के व्यक्ति राजनीति की तरफ आकृष्ट होंगे जिससे स्वस्थ राजनीतिक माहौल बनेगा। चुनाव आयोग दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है और अब अगर इस तरह की विशेष अदालत की स्थापना की जाती है तो यह राजनीति को अपराध से बचाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होगा। देखना यह होगा कि सर्वोच्च न्यायालय की इस मंशा के अनुसार केंद्र सरकार इस दिशा में क्या कारगर कदम उठाती है।
’जितेंद्र कुमार, जालोर, राजस्थान

मुट््ठी में रेत
कश्मीर समस्या हल करने की दिशा में पहल करते हुए गृह मंत्रालय ने सभी पक्षों से वार्ता करने के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा की वार्ताकार के रूप में नियुक्ति की है और उन्हें कैबिनेट सचिव का दर्जा दिया है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि दिनेश्वर शर्मा स्वयं तय करेंगे कि उन्हें किन लोगों और पक्षों से बात करनी है। यह एक तरह से भारत सरकार का कश्मीर समस्या पर ‘यूटर्न’ है क्योंकि मौजूदा सरकार की अभी तक नीति रही है कि अलगाववादी नेताओं से कोई बात नहीं होगी। दिनेश्वर शर्मा भी यदि इसी नीति पर कायम रहते हैं तो उन्हें वार्ताकार बनाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। पूर्व में मनमोहन सिंह सरकार ने दिलीप पडगांवकर और राधा कुमार को वार्ताकार नियुक्त किया था, लेकिन अलगाववादियों के बहिष्कार करने के कारण वह पहल बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे ही समाप्त हो गई थी। दिनेश्वर शर्मा यदि अलगाववादियों को वार्ता के मेज पर लाने में सफल नहीं हुए तो इस पहल का भी वही हश्र होगा जो पूर्व की पहल का हुआ है।

एक गंभीर सवाल यह भी है कि जब कश्मीर समस्या का हल राजनीतिक स्तर पर ही संभव है तो एक पूर्व पुलिस अधिकारी को यह काम सौंपना कहां तक उचित है? क्या वे अपने पुलिसिया नजरिये से मुक्त हो पाएंगे? आईबी के पूर्व डायरेक्टर यानी एक पुलिस अधिकारी से यह अपेक्षा करना कि वे कश्मीर समस्या के किसी राजनीतिक समाधान तक पहुंच पाएंगे, रेत को मुट्ठी में समेटने की तरह दुष्कर है! अगले कुछ दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत सरकार की यह पहल कितनी कारगर रही है।
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

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