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समानता के पेच

समान नागरिक संहिता का बड़ा असर हिंदुओं पर पड़ेगा, बनिस्बत मुसलमानों के।
Author नई दिल्ली | November 14, 2016 03:16 am
( फाइल फोटो)

आजकल समान नागरिक संहिता पर बहस छिड़ी हुई है। वैसे तो ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जिन्हें जानकारी ही नहीं कि समान नागरिक संहिता है क्या। राजनीतिक दृष्टि से समान नागरिक संहिता के नाम पर लोग बस इतना जानते हैं कि मुसलमान, उनके धार्मिक रीति रिवाज और निजी कायदे उस कानून के अंदर आ जाएंगे जिसमें बाकी सब आते हैं। कुछ हद तक यह बात सही है, पर क्या लोगों को जानकारी है कि देश में अंग्रेज कॉमन क्रिमिनल कोड भी बना गए थे जो आज देश के हर नागरिक पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो? आज देश में अपराध, उसकी परिभाषा और सजा तीनों धर्म आधारित नहीं हैं। खैर, कुछ मुद््दे आज भी देश में इस प्रकार के हैं जिन्हें धर्म के आधार पर निजी कानून के तहत देखा जाता है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण, गोद लेना आदि ऐसे मामले हैं जिनके बारे में कानून तो हैं, पर वे धार्मिक रीति-रिवाजों के आधार पर हैं। इसमें हिंदुओं का हिंदू पर्सनल कानून है तो मुसलमानों का मुस्लिम पर्सनल कानून है, इसी प्रकार ईसाइयों का भी है।

हिंदुओं का खासकर उत्तराधिकार कानून, दो पद्धतियों पर है। एक मिताक्षरा दूसरा दायभाग। यहां एक बात समझने की है कि समान नागरिक संहिता का बड़ा असर हिंदुओं पर पड़ेगा, बनिस्बत मुसलमानों के। इसे सामाजिक दृष्टिकोण के बजाय आर्थिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। मुसलिम समाज अत्यंत सीमित रीति-रिवाजों से ‘संचालित’ होता है, उसमें भी पूरे देश में धार्मिक समानता पाई जाती है। यहां असल सवाल तो हिंदुओं का है जहां हर दस किलोमीटर बाद बोली से लेकर रीति-रिवाज और पहनावा तक बदल जाता है।

दूसरे, कई बड़ी-बड़ी संपत्तियां हैं जो हिंदू संयुक्त परिवार के नाम पर अटकी पड़ी हैं। हिंदू संयुक्त परिवार की कर-गणना अलग तरीके से होती है। कई फर्म, बिजनेस आदि इसके अंतर्गत हैं। आज अनेक मंदिर और ट्रस्ट हैं जिनके पास अरबों की संपत्ति है। इन सब पर समान नागरिक संहिता का भारी असर पड़ेगा। खैर, दिखने में यह बड़ा आसान विषय लगता है, पर है अत्यंत जटिल। आप रीति-रिवाज को अलग कर हिंदू, मुसलिम और ईसाई सब पर लागू हो सके, ऐसी कोई विवाह की परिभाषा तो दीजिए!
’देवेंद्रराज सुथार, बागरा, जालोर, राजस्थान

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