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शेखी और सच

चीन की कथित जन मुक्ति सेना के 90-साला जश्न पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जमकर शेखी बघारी। उनके अनुसार चीनी फौज अपराजेय है। लेकिन पिछले पचास वर्ष का इतिहास तो कुछ और ही बताता है।
Author August 8, 2017 06:02 am
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फाइल फोटो)

शेखी और सच

चीन की कथित जन मुक्ति सेना (पीएलए) के 90-साला जश्न पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जमकर शेखी बघारी। उनके अनुसार चीनी फौज अपराजेय है। लेकिन पिछले पचास वर्ष का इतिहास तो कुछ और ही बताता है। 1969 में उसूरी नदी पर रूसी सैनिकों के एक दस्ते को चीनियों ने घात लगा कर मार डाला था। अपने लगभग 80 जवानों की शहादत का बदला लेने के लिए रूस ने तब चीन के 800 फौजी मार गिराए थे। पीएलए मोर्चे पर से गीदड़ों जैसी भागती नजर आई थी। इसके दो वर्ष पूर्व 1967 में बिलकुल ऐसी ही घटना में चीनी फौज को सिक्किम के नाथुला व चोला में भारतीय सेना ने शिकस्त का मजा चखा रखा था। लेकिन पांच दशकों में चीनियों को सबसे अपमानजनक पराजय नन्हे-से वियतनाम द्वारा 1979 में मिली जब ड्रैगन की दो लाख फौज उस पर चढ़ आई थी।

अमेरिका का दंभ चूर-चूर करने वाले वियतनाम ने चीन को उसी प्रकार का जवाब देते हुए उसके 63,000 सैनिक यमलोक भेजे, जबकि उसे स्वयं 26 हजार जवान गवाने पड़े। इसी पीएलए ने 1987 में अरुणाचल का सामुद्रोंग चू (जिला तवांग) क्षेत्र शीतकाल में चुपचाप हथिया लिया था (वैसे ही जैसे 1999 में पाक ने कारगिल में किया)। भारत को पता चलने के बाद सेनाध्यक्ष जनरल के सुंदरजी ने बड़ी संख्या में टी-72 टैंक तथा सेना वहां भेजी। चीन की बंदर घुड़कियों को नजरअंदाज करते हुए भारत ने दृढ़ता का परिचय दिया और आखिरकार बिना प्रत्यक्ष युद्ध लड़े चीन को वहां से हटना पड़ा। पिछले पचास वर्षों में चीनी फौज को मिलने वाली सफलताओं में दक्षिण चीन सागर के महज दो छोटे द्वीपों- मिस्चिफ रीफ और पारासेल पर किया कब्जा ही है। इसलिए, शी जिनपिंग साहब, घना मत इतराइए।
’अजय मित्तल, मेरठ
घटिया भोजन

ट्रेनों में घटिया खाना दिए जाने की बात बार-बार सामने आ रही है। कुछ दिन पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की संसद में पेश रपट में बताया गया था कि ट्रेनों में खाने की क्वालिटी काफी बदतर है और यह इंसानों के खाने लायक नहीं है। लेकिन सरकार या रेलवे ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। अब बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में एक यात्री के ब्रेड पकौड़े में कीड़ा निकला है। ट्रेन की पेंट्री कार के कर्मचारियों ने यात्री को यह ब्रेड पकौड़ा दिया था और इसकी कीमत 30 रुपए वसूल की थी। जब यात्री अपने बेटे को यह पकौड़ा खिला रहा था तो कुछ कौर के बाद कीड़ा उन्हें दिखाई दे गया। दुख की बात है कि एक ओर तो सरकार यात्रियों पर किराए का बोझ बढ़ाती जा रही है, दूसरी तरफ यात्री कीड़े वाला गंदा खाना खाने को मजबूर हैं। आखिर आम आदमी क्या करे, किससे शिकायत करे? सरकार तो कुछ सुनने या सुधार करने को लेकर गंभीर दिखाई नहीं दे रही।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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