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चौपाल: दान या दिखावा

हम निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर हैं पर विकास की इस दौड़ में अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।
Author नई दिल्ली | November 1, 2016 06:20 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हम निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर हैं पर विकास की इस दौड़ में अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। पिछले दिनों मैं बरेली के बस स्टैंड पर देखा कि एक अधेड़ अपाहिज व्यक्ति के बगल में तीन लोग खड़े थे और उनके हाथ में खाने का कुछ सामान था, जिसे उस व्यक्ति को दे रहे थे। यह दृश्य देखकर बड़ी खुशी हुई कि आज भी दूसरों का खयाल रखने वाले लोग इस दुनिया में हैं। तभी अचानक आवाज आई, ‘स्माइल तो करो।’

पीछे मुड़कर देखा तो एक महाशय हाथ में कैमरा लिए उन लोगों की फोटो खींच रहे थे। यह देख कर दुख हुआ। समझ नहीं आया कि वे लोग उस अधेड़ की परेशानी से परेशान हो रहे थे या खुश हो रहे थे क्योंकि मुझे नहीं लगता कि साठ साल का ऐसा व्यक्ति जिसका एक पैर न हो, जिसे सुबह से खाना न मिला हो, वह किसी कैमरे के सामने ‘स्माइल’ दे सकता है। वक्त बदल रहा है। लोग दूसरे के दुख के बारे में नहीं सोचते। वे अगर किसी को दान देते हैं तो यह सोच कर कि सोशल मीडिया के लिए हमारी एक ‘पोस्ट’ बन जाएगी, एक फोटो बन जाएगी। लोगों को सामने वाले की भूख और परेशानी से ज्यादा अपनी फोटो के पोज की चिंता होती है। आज लोग दान की जगह पर दिखावा करने में ज्यादा यकीन रखते हैं। यह कैसा बदलाव है!
’सुकांत तिवारी, नई दिल्ली

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