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वक्त के साथ

आधुनिक होती जा रही दुनिया की रेतघड़ी से वक्त बहुत तेजी से फिसलता जा रहा है! नई पीढ़ियां तकनीकी सलाखों से दूरियों वाली खाई खोदती जा रही हैं।
Author July 18, 2017 05:08 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

वक्त के साथ

आधुनिक होती जा रही दुनिया की रेतघड़ी से वक्त बहुत तेजी से फिसलता जा रहा है! नई पीढ़ियां तकनीकी सलाखों से दूरियों वाली खाई खोदती जा रही हैं। बेशक तकनीक के योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन गौर फरमाने वाली बात यह है कि तकनीक हमें हरी-भरी डाल से कब काट का अलग कर देती है, पता ही नहीं चलता है। संयुक्त परिवार की बानगी के बिखरने की एक मुख्य वजह यह भी है। कहा जाता है कि मां और ममता एक-दूसरे के पूरक हैं। मां परिवार का वट वृक्ष होती है। घर-परिवार पर कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आई हो, उस समय भी मां के अंदर उतना ही जीवट दिखता है जितना आम दिनों में। खुशी के पल हों तो बस उसका आंचल सर पर पड़ जाए! लगेगा कि सदियों का सुखद एहसास मिल गया। लेकिन यह ममता और जीवटा की परंपरा दिनोंदिन खोखली होती जा रही है। मां की ममता में रत्ती भर बदलाव नहीं है, बदल तो हमारी पीढ़ियां रही हैं। गांवों में तो स्थिति कुछ हद तक ठीक है लेकिन महानगरीय जीवन की दशा बड़ी ही दयनीय है। पहले पढ़ाई, फिर करियर और आजीविका में सब उलझ कर रह गए हैं। और जो समय बचता है, उसे तकनीक हर लेती है। बेशक, ये पीढ़ियां अपने पैर तो जमा लेती हैं, जो जरूरी भी है मगर इस बीच परिवार और बुजुर्ग ऐसे छूट जाते हैं जैसे गांव का पुराना मकान। यही असंवेदनशीलता आगे चल कर असाध्य रोग में तब्दील हो जाती है।

बहरहाल, वक्त के साथ ये पीढ़ियां अपनी प्राथमिकताओं पर तो ध्यान दे रही हैं। इसी संघर्षों के समर में से कुछ पल चुरा कर परिवार की नींव को भी सींचना होगा जिससे उन्हें खुशियों को बांटने वाला मन और दुख की घड़ी में सिर पर हाथ फेरने वाला तन मिल सके। इससे निबटने का उपाय यह है कि सामाजिकता को अपने व्यवहार में लाएं, जिससे न सिर्फ भावनाएं जुड़ेंगी बल्कि सरोकारिता भी बढ़ेगी। करियर की सफलता और संवेदनशीलता को मिला कर एक बेहतर संसार रचने का सफल प्रयास नए सिरे से किया जा सकता है।
’पवन मौर्य, बनारस
सुरक्षा में चूक
लखनऊ विधानसभा में विस्फोटक सामग्री पीईटीएन का पाया जाना प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठाता है। पीईटीएन यानी पेंटा एरीथ्रीटोल टेट्रा नाइट्रेट की 500 ग्राम मात्रा विधानसभा को दहलाने के लिए काफी थी। जब प्रदेश की राजधानी में, वह भी विधानसभा में इस प्रकार की घटना हो सकती है तो अन्य क्षेत्रों की सुरक्षा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।  सवाल है कि इतनी गहन सुरक्षा के बीच भी यह विस्फोटक विधानसभा के अंदर पहुंचा कैसे? अंदर के किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी सहायता से ही ऐसा किया जा सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि ‘घर का भेदी लंका ढहाए’ जैसी कुछ बात अवश्य है। इस घटना ने सरकार की कथनी और करनी में स्पष्ट अंतर स्पष्ट कर दिया और यह भी दिखा दिया कि सरकार सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर कितनी नाकाम है।
’आकाश यादव, मालीपुर, आंबेडकरनगर

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First Published on July 18, 2017 5:08 am

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