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चौपाल- विद्वेष की जाति, राहत के लिए

आज भी जाति को लेकर त्रासद और शर्मनाक घटनाएं हमारे सामने आ रही हैं जो हमारी सात दशक की आजादी के मायने को आईना दिखाती नजर आती हैं।
Author October 10, 2017 01:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विद्वेष की जाति

जाति के दंश को झेलता दलित समुदाय सदियों से सिर झुका कर जीने के लिए विवश रहा है। आज भी जाति को लेकर त्रासद और शर्मनाक घटनाएं हमारे सामने आ रही हैं जो हमारी सात दशक की आजादी के मायने को आईना दिखाती नजर आती हैं। हाल ही में गुजरात के आणंद में गरबा समारोह में शामिल होने पर एक दलित युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। दूसरी घटना गुजरात में एक गांव में हुई जहां दो दलित युवाओं को मूंछ रखने की वजह से पीटा गया। इन घटनाओं से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि कुछ लोगों के दिमाग में दलितों के प्रति कुंठा और जहर किस स्तर तक भरा हुआ है। आए दिन अखबारों के पन्नों पर हमें दलितों पर होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न की घटनाएं पढ़ने को मिलती हैं। इन घटनाओं के बाद प्रशासन की ओर से किस तरह की कार्रवाई की जाती है, उन सबसे हम सब वाकिफ हैं। अफसोस यही है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ताकत का अभाव दलितों को न्याय से भी वंचित कर देता है।

दरअसल, इस तरह की मानसिकता रखने वाले लोग दलितों को थोड़ी-बहुत तरक्की करते, उनके रहन-सहन में हो रहे छिटपुट बदलावों को देख कर अपनी कुंठित मानसिकता का परिचय दिए बिना खुद को रोक नहीं पाते हैं और इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते है। पहले दलित तबका चुपचाप इसे सहन करते थे। लेकिन अब एक स्तर पर प्रतिक्रिया भी सामने आ रही है। मसलन, मूंछ रखने पर पिटाई की घटना के बाद दलित युवाओं ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाया, जिसमें देश भर में मूंछ रखने वाले दलित युवाओं ने अपनी-अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डाली। यह पहल सुर्खियों में रही। वहीं गरबा देखने पर दलित युवक को पीट-पीट कर मार डालने की घटना पर भी दलितों ने सामाजिक दृष्टिकोण से ही इसका विरोध किया। दलित समुदाय से जुड़े लोगों ने अपने आदर्श डॉ आंबेडकर के नाम से गरबा का आयोजन कर आंबेडकर पर बने गीतों पर गरबा-नृत्य किया। युवाओं की यह मुहिम ऐसे जातिवादी लोगों के लिए एक सख्त संदेश है कि दलित समुदाय अब उन पर होने वाले अत्याचारों को नहीं सहेगा। किसी भी सभ्य समाज के निर्माण में इस प्रकार के तथाकथित जातिवादी लोग अवरोधक का काम करते हैं।

दरअसल, जाति के अहं में डूबे लोगों के पास कोई मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता। वे आज भी रूढ़ियों का आलाप करते रहते हैं। आखिर क्या वजह है कि आधुनिक दौर में भी हम इस तरह के लोगों के बीच रह रहे हैं जो किसी की बढ़ी हुई मूंछ को देख कर असहज हो जाते हैं। क्या किसी जाति विशेष का मूंछों पर एकाधिकार है? सबको यह सोचने की जरूरत है कि कहीं हम भी इस जातिवाद के मनोरोग से ग्रसित तो नहीं हैं! अब भी हम अगर अपनी सोच का स्तर बढ़ाएं तो यह समाज और देश के लिए बेहतर होगा।
’गौरव कुमार, दिल्ली

राहत के लिए
देश में प्रदूषण अपने चरम पर पहुंच गया है। आज शहरों में वे तमाम छोटे-छोटे बच्चे दिख जाते हैं जो मुंह पर मास्क लगाए अपने स्कूल जाते हैं। उन्हें देख कर पहला सवाल दिमाग में यही आता है कि यह उनका वर्तमान है तो भविष्य क्या होगा! देश में वायु प्रदूषण का आंकड़ा आसमान छूने लगा है। अगर कभी ट्रैफिक में फंस जाए तो सांस लेना दूभर हो जाता है। हजारों लोगों की जान इस प्रदूषण की भेंट चढ़ जाती है, फिर भी हम चेत नहीं रहे हैं। क्यों नहीं इस दिवाली पर हम यह संकल्प लें कि पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान देकर हम इसे सार्थक करेंगे। हम संकल्प लें कि जो पैसे हमने पटाखे न खरीद कर बचाए हैं, वे किसी जरूरतमंद को दें। यकीन मानिए, इसका अहसास बेहद सुखद होगा कि इस तरह हमारी दिवाली कितनी सार्थक हो गई है। एक छोटा-सा कदम ही बड़े-बड़े रास्ते तय करता है।
’शिल्पा जैन सुराणा, वारंगल, तेलंगाना

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