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बजट से उम्मीद, दुरुस्त आयद

बजट में क्या मिलेगा, किसको मिलेगा, कितना मिलेगा जैसे सवाल लगातार हर किसी के दिमाग में चल रहे हैं।
Author February 1, 2017 02:52 am
वित्त मंत्री अरुण जेटली। (फाइल फोटो)

बजट से उम्मीद

बजट में क्या मिलेगा, किसको मिलेगा, कितना मिलेगा जैसे सवाल लगातार हर किसी के दिमाग में चल रहे हैं। चाय की दुकान से लेकर दफ्तरों तकबजट की ही बातें हो रही हैं। हर कोई अपने फायदे की सोच रहा है। कोई करों में कमी चाहता है तो कोई सस्ता सामान। लोग काफी उम्मीद पाले हैं बजट से लेकिन इसी बीच चुनाव का माहौल भी है। देखना होगा कि कहीं बजट की चर्चा इन्हीं पांच राज्य तक सीमित न रह जाए!

क्या बजट के बहाने सरकार राज्यों की जनता को कुछ लालच देने वाली है जिनमें चुनाव होने हैं? केंद्र सरकार पहले भी ऐसा कर चुकी है भले वह बजट न हो मसलन, बिहार का पैकेज, कश्मीर का पैकेज। इन पैकेजों से मिला कितने लोगों को यह सोचने वाली बात है। क्या केंद्र सरकार फिर ऐसा करने वाली है बजट के माध्यम से? क्या बाकी राज्यों के लोगों की आस टूट जाएगी? या केंद्र सरकार एक मध्य मार्ग का चुनाव करेगी? ये सभी सवाल आज सबके सामने खड़े हैं। इनका जवाब सरकार कैसे देती है, यह देखने लायक होगा।

’अभय, जामिया, नई दिल्ली
दुरुस्त आयद

केंद्र सरकार ने हाल ही में अकर्मण्यता के आधार पर भारतीय पुलिस सेवा के दो अधिकारियों और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी को जबरन रिटायर कर दिया। शीर्ष पदों पर आसीन अयोग्य अधिकारियों को नौकरी से निकाला जाना एक सराहनीय कदम है। सरकारी सेवा की सबसे बड़ी खामी यही है कि इसमें कार्य संस्कृति का घोर अभाव है और निकम्मे व भ्रष्ट अधिकारियों को भारी आर्थिक बोझ वहन करते हुए झेला जाता है। कोई काम करे या न करे, कोई फर्क नहीं पड़ता।

पद का दुरुपयोग कर अथाह संपदा बटोरने वालों को दंड का भय न के बराबर होता है। बिना जवाबदेही के पदोन्नति मिलना और वेतन में बढ़ोतरी होना सामान्य प्रक्रिया है। 35-40 वर्ष तक की आरामतलबी, अच्छा वेतन और ऊपरी कमाई का बढ़िया जरिया बनी हुई सरकारी नौकरियों ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इससे प्रशासनिक व्यवस्था लुंज-पुंज हो चुकी है। नौकरी के प्रोबेशन की अवधि से ही निकम्मे और भ्रष्ट कर्मचारियों को निकाल बाहर करने के सख्त प्रावधान किए जाने चाहिए। ‘सब चलता है’ वाली अति नुकसानदायक मानसिकता पर सख्त प्रहार करने की जरूरत है।
’प्रीतम सिंह उदार, गांव भरथल, दिल्ली

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