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मौत का खेल

दुनिया भर की पुलिस किशोर आत्महत्याओं और इस खेल के बीच किसी ठोस कड़ी को अब भी स्थापित करने में विफल रही है।
Author September 12, 2017 05:11 am
मंत्रालय ने इस गेम पर रोक लगाने के साथ ही सभी सर्च इंजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ब्लूव्हेल गेम को डाउनलोड करने का लिंक हटाने के निर्देश दिए हैं,

मौत का खेल
दुनिया भर में तीन सौ और भारत में तीन-चार किशोरों की जान लेने वाले आॅनलाइन विडियो गेम ब्लू व्हेल को संभवत: कजाकिस्तान, किर्गिस्तान या रूस में विकसित किया गया है। तथ्यों की पड़ताल करने वाली वेबसाइट ‘स्नोपेस डॉट कॉम’ के अनुसार इसका नामकरण ब्लू व्हेल की जीवन शैली को ध्यान में रख कर किया गया है। यह व्हेल अक्सर अपनी जान देने के लिए छिछले समुद्री तट पर आ जाती है और तड़प-तड़प कर मौत को गले लगाती है। हालांकि दुनिया भर की पुलिस किशोर आत्महत्याओं और इस खेल के बीच किसी ठोस कड़ी को अब भी स्थापित करने में विफल रही है।

फिलवक्त देश की सियासी संवेदन शून्यता उस ऊंचाई पर पहुंच चुकी है जहां मानवीय लापरवाही के चलते सैकड़ों शिशुओं की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क गौरी लंकेश जैसी हवा के खिलाफ लिखने वाली पत्रकार की हत्या से भी नहीं पड़ता है। डिस्कवरी चैनल के अनगिनत बार देखे हुए उस दृश्य को याद कीजिए जहां शेर सैकड़ों जंगली भैंसों के झुंड में से कमजोर भैंसे को चुन कर शिकार बनाता है। बचे भैंसों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे यंत्रवत वहीं आसपास टहलते रहते हैं। कमोबेश समाज भी उसी अवस्था में पहुंच रहा है। गनीमत है कि न्यायपालिका ने अब भी अपना महत्त्व बरकरार रखा है। मद्रास हाईकोर्ट ने पुलिस से आग्रह किया है कि वह ब्लू व्हेल की गिरफ्त में आए युवाओं को बचाने के लिए अपने प्रयास तेज करे।

वैसे तो जीवन की ‘एक्सपायरी’ तयशुदा है पर तारीख निश्चित नहीं है। असंभव टास्क पूरा करने वाले विद्रोही तेवर वाले किशोर या परिस्थितिवश स्वयं को असफल मान लेने वाले आत्महत्यारे सहानुभूति के पात्र नहीं हो सकते। जीवन को वरदान मानने की समझ जो विकसित नहीं कर पाता है उसे क्षमा नहीं किया जा सकता। मौजूदा दौर सूचना और टेक्नोलॉजी के अंधड़ का है। इसने अपना आसान शिकार पारिवारिक मूल्यों को बनाया है। भीड़ में भी व्यक्ति अकेलेपन से ग्रस्त है। आभासी दुनिया की चकाचौंध सबसे पहले रिश्तों को निगलती है। कोर्ट के संज्ञान लेने से पहले परिवार नाम की संस्था का सचेत होना जरूरी है। भारतीय समाज पुरातन सोच के लिए बदनाम है। पर सुदूर शांत कस्बे भी इस अंधड को अपनी दहलीज पर महसूस करने लगे हैं। अब तक पोर्न ही चिंता का कारण हुआ करता था, अब नीली मछली भी भारतीय परिवारों के लिए सिरदर्द बनने जा रही है।
’रजनीश जैन, शुजालपुर, मध्यप्रदेश

समझ से परे
सिनेमाहाल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान पर अनिल हासानी की आपत्ति (‘दिखावे का देशप्रेम’, चौपाल, 6 सितंबर) समझ से परे है। आजकल राष्ट्रगान पर टीका-टिप्पणी करना एक फैशन-सा हो गया है। किसी को स्कूल में होने वाले राष्ट्रगान पर आपत्ति है तो किसी को सिनेमाहाल में। यही कारण है कि हमारे अनेक सांसदों और विधायकों तक को राष्ट्रगान याद नहीं है, जैसा कि कई बार खबरिया चैनलों पर भी दिखाया गया।

फिल्म कैसी भी हो, राष्ट्रगान के समय सभी दर्शकों के मन में उसी तरह राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना का संचार होता है जिस तरह किसी धार्मिक स्थल पर जाने से मन में उस धर्म के प्रति आस्था का। कल कोई यह भी कह सकता है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को जो कार्यक्रम होता है वह भी बेमानी है क्योंकि राष्ट्रप्रेम की भावना तो भीतर से आनी चाहिए! अगर विरोध ही करना है तो समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता आदि बुराइयों का करें न कि किसी स्वस्थ परंपरा का।
’विजय कृष्ण, औक्सी होम्ज, गाजियाबाद

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