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खतरे की घंटी, न्याय का डर

अमेरिका ने एक हफ्ते के अंदर दो बड़े हमले करके दुनिया को फिर यह अहसास दिला दिया है कि वह अपने प्रभुत्व को वैश्विक पटल पर खोना नहीं चाहता।
Author April 19, 2017 05:08 am
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति। (फाइल फोटो) REUTERS/Jonathan Ernst

खतरे की घंटी

अमेरिका ने एक हफ्ते के अंदर दो बड़े हमले करके दुनिया को फिर यह अहसास दिला दिया है कि वह अपने प्रभुत्व को वैश्विक पटल पर खोना नहीं चाहता। ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा देकर राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार में कहा था कि अमेरिका को वैश्विक समस्याओं में नहीं उलझना चाहिए और अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हालांकि उन्होंने इस्लामिक स्टेट का पूरी तरह सफाया करने का वायदा भी किया था। लेकिन सीरिया के सरकारी हवाई ठिकाने पर दनादन 59 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें दागने के एक सप्ताह के भीतर ही अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के ठिकाने पर अब तक का सबसे बड़ा गैर-परमाणु बम गिराया जाना ट्रंप के बदले हुए तेवर को दिखाता है। इन दो हमलों की गूंज उत्तर कोरिया समेत दूर-दूर तक सुनाई दे रही है।

उत्तर कोरिया एक नए परमाणु परीक्षण की तैयारी में है। ऐसे में अमेरिका की ताजा कार्रवाई से उत्तर कोरिया के आलाकमान की नींद जरूर गायब हुई होगी। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कोरिया प्रायद्वीप के करीब अमेरिका का हमलावर बेड़ा पहुंच चुका है और ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा है कि अमेरिका किसी भी उकसावे वाली कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेगा। वहीं चीन ने कोरिया प्रायद्वीप में युद्ध के मंडराते बादलों के बीच रूस से सहयोग मांगा है। अब तक पांच परमाणु परीक्षण कर चुका उत्तर कोरिया एक ऐसा रॉकेट बनाना चाहता है जो अमेरिकी भूभाग तक आयुध सामग्री पहुंचाने में सक्षम हो। अटकलें ये भी लगाई जा रही हैं कि उत्तर कोरिया जल्द ही छठा परमाणु परीक्षण करना चाहता है।इक्कीसवीं सदी में सब अमन पसंद लोग यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि बीसवीं सदी की गलतियों से सबक लेकर दुनिया के सभी मुल्क इस सदी में वैश्विक बंधुत्व और चैनो-अमन के साथ समृद्धि की ओर कदम बढ़ाएंगे। लेकिन इसके विपरीत आज भी दुनिया का बड़ा हिस्सा गृहयुद्ध, हिंसा तथा भौगोलिक सीमा विवादों में उलझा हुआ है। दुनिया में बढ़ते उग्र राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरतावाद ने वैश्विक समस्याओं को और जटिल तथा गंभीर बना दिया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बना संयुक्त राष्ट्र नंख-दंतहीन होने के कारण वैश्विक समस्याओं के निवारण में असहाय नजर आ रहा है। ऐसे में बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया के लिए सशक्त और पर्याप्त वैश्विक प्रतिनिधित्व वाले संयुक्त राष्ट्र की दरकार है। इसके बिना छोटे-छोटे देश जिस तरह परमाणु जखीरा इकट्ठा करने में लगे हुए हैं, वह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। इसे अनसुना करने से संपूर्ण मानव जगत के अस्तित्व पर ही संकट आ सकता है।
’कैलाश मांजु बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली
न्याय का डर

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि बिना कारण तलाक देने वालों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। सवाल है कि वह महिलाओं को समानता का अधिकार देने से बच क्यों रहा है? बोर्ड को उन मामलों पर गौर फरमाना चाहिए जिनमें बेवजह औरत को घर से बेदखल कर दिया गया है। उसके बहिष्कार अभियान से तलाक रोकने के पुख्ता इंतजाम कैसे हो जाएंगे?
विरोधाभास देखिये कि पर्सनल लॉ बोर्ड अयोध्या मंदिर विवाद को तो न्यायालय से सुलझाने की अपील कर रहा है लेकिन तीन तलाक के गंभीर मसले पर न्यायालय के न्याय से डर रहा है। वह एक ही बात दोहराए जा रहा है कि तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं के मामलों में से दस प्रतिशत भी सच नहीं हैं। ठीक, दस प्रतिशत ही सही, पर ये मामले सोच से ज्यादा भयावह हैं।
’चंद्रकांत, एएमयू, अलीगढ़

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