December 02, 2016

ताज़ा खबर

 

चौपाल: मन की गांठें

भारतीय संदर्भ में जड़ बनी मान्यताएं पुरुषवादी और कुलीनवादी मानसिक परिवेश का दबाव निरंतर बनाए हुए हैं।

Author October 25, 2016 03:16 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

संपादकीय ‘पसरता अवसाद’ (11 अक्तूबर) भारत में पसरते मानसिक रोगों का जीवंत विश्लेषण सामने रखता है, हमारे समाज के रोगग्रस्त होने की ओर इशारा करता है। भौतिकता की आपाधापी, मनचाहा पाने की विफलता, घुटन और बंदिशों के पार जीवन की तलाश में कहीं न कहीं मानव जीवन, खासतौर पर महिलाओं का दम घुट रहा है। भारतीय संदर्भ में जड़ बनी मान्यताएं पुरुषवादी और कुलीनवादी मानसिक परिवेश का दबाव निरंतर बनाए हुए हैं। जिसके चाहे-अनचाहे पहली शिकार महिला और दलित होते हैं। पिछले दिनों एक महिला सम्मेलन में इसी परिवेश के मद्देजनर यह बात सामने आई थी कि हमारे देश में महिला या दलित चाहे जितने संपन्न या ऊंचे ओहदे पर क्यों न पहुंच जाए, उनके उत्पीड़ित होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है।

ऐसी घटनाएं रोजमर्रा की खबरों में हमें मिल जाती हैं। लेकिन हम उनका विश्लेषण कर हम उनसे कितना सीख लेते हैं। हम रावण को बुराई प्रतीक मान कर हर साल दशहरे पर उसके पुतले को जला आते हैं। लेकिन सच और झूठ क्या है, जिससे हम रोज दो-चार होते हैं, लेकिन माथा कहीं और खपाते हैं। जो समाज या सरकार अपना फरमान सुना दे, उसी के कहे को सच मान हुंकारा लगा देते हैं। सच की तह में कितने लोग जाते हैं। यह बात हम तक सीमित नहीं है। पुरुषवादी मानसिक फूहड़पन की झलक अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन की बहस में भी मौजूद है। हलेरी जब महिलाओं के प्रति की गई ट्रंप की टिप्पणियों पर तंज कसती हैं तो ट्रंप हिलेरी पर उनके पति बिल क्लिंटन की सताई महिलाओं के आरोप उन पर मढ़ते हैं। देखिए किस तरह पति की गलतियां पत्नी पर आरोपित हो रही हैं। सवाल आरोप से बड़ा मानसिक सोच का है।

बात चली थी कि महिला कितनी ही सक्षम और ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाए, उसके उत्पीड़न की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। यह पूर्व के अनेक उदाहरणों की तरह हाल ही सामने आए घटनाक्रम से चरित्रार्थ हो गया है। कानपुर देहात की एक महिला मजिस्ट्रेट ने अपनी इच्छा से एक वकील को पति के तौर पर चुना था। वह उसके हाथों मारी गई! एक महिला राजस्थान सरकार की सेवा में वरिष्ठ अधिकारी हैं। वे अपने मुख्य सचिव जैसे अहम ओहदे पर बैठे पति से न केवल खुद पीड़ित हैं, बल्कि उनकी बेटी भी पीड़ित बताई गई है। यही स्थिति दलितों को लेकर भी रोज नए उदाहरणों के साथ सामने आती रही है। इससे थोड़ा अलग ऐसे विषय और भौतिक कारक, जोे समाज में निरंतर गहरे हो रहे हैं, अपना इच्छित नहीं पा सकने की हताशा से उपजे अवसाद में अपना जीवन घोंट रहे हैं। स्समय रहते हमने इसका इलाज नहीं किया तो यह महामारी का रूप धारण कर लेगी। संवादहीनता और बढ़ती खामोशी अवसाद के कारक बन कर कहीं न कहीं अपराध में भी तब्दील हो जा रही है।
’रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 25, 2016 3:16 am

सबसे ज्‍यादा पढ़ी गईंं खबरें

सबरंग