June 26, 2017

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विज्ञान और विकास

इस प्रक्षेपण से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारतीयों का अंतरिक्ष में अपने दम पर जाने का सपना पूरा हो सकेगा, साथ ही इंटरनेट गति प्रति सेकेंड एक गीगाबाइट से बढ़ाकर चार गीगाबाइट की जा सकेगी।

Author June 19, 2017 05:22 am
इसरो ने पहले तो चंद्रयान केवल 386 करोड़ रुपए में और फिर मंगलयान 450 करोड़ रुपए में अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजकर अपने दुनिया भर में किफायती प्रक्षेपण का लोहा मनवाया है।

विज्ञान और विकास

इसरो की उपलब्धियों में पिछले दिनों एक अध्याय और जुड़ गया जब तीन सौ करोड़ रुपए की किफायती लागत से बने देश के सबसे बड़े तथा शक्तिशाली स्वदेशी रॉकेट भू स्थिर प्रक्षेपण यान यानी जीएसएलवी-एमके 3 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित कर दिया गया। इस प्रक्षेपण से सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारतीयों का अंतरिक्ष में अपने दम पर जाने का सपना पूरा हो सकेगा, साथ ही इंटरनेट गति प्रति सेकेंड एक गीगाबाइट से बढ़ाकर चार गीगाबाइट की जा सकेगी। इसके साथ ही भारत चार टन वजनी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने वाले चुनिंदा देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है। इसरो की दो विशेषताएं उसे दुनिया में सबसे अलग और महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष एजेंसी बनाती हैं। एक तो उसने बहुत कम लागत में कोई भी अभियान पूरा करने में सफलता हासिल कर ली है। इसरो ने पहले तो चंद्रयान केवल 386 करोड़ रुपए में और फिर मंगलयान 450 करोड़ रुपए में अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजकर अपने दुनिया भर में किफायती प्रक्षेपण का लोहा मनवाया है। दूसरी बात यह कि इसरो की विफलता की दर अन्य सभी अंतरिक्ष एजेंसियों से काफी कम है। यहां तक कि इस बाजार में भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी चीन की एजेंसी से भी काफी कम।

विफलता की दर कम होना अंतरिक्ष बाजार में साख का सबसे बड़ा आधार होता है। आज जब निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष में रुचि बढ़ रही है तो इसरो अंतरराष्ट्रीय फलक पर व्यावसायिक प्रतिष्ठान के रूप में उभर सकता है। इसरो की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स का मानना है कि हर साल लगभग 500 छोटे और माइक्रो उपग्रह तैयार कर बाजार में अपनी बेहतर धाक जमा सकेगा। भारत ने तीन महीने पहले एक साथ सौ से ज्यादा उपग्रह भेज कर अंतरिक्ष बाजार में दबदबा बनाने की कोशिश की है, मगर चीन भारी उपग्रह भेजने में दुनिया में सबसे आगे है। लेकिन एक अहम सवाल यह भी है कि अंतरिक्ष की उपलब्धियों को भारत विज्ञान के अन्य क्षेत्रों, जैसे रक्षा तथा चिकित्सा क्षेत्रों में क्यों नहीं दोहरा पा रहा है? क्या कारण है कि हमारे शोध संस्थान और विश्वविद्यालयों में दोयम दर्जे की रिसर्च ब्यूरोक्रेसी पनप रही है? क्यों भारत की झोली में विज्ञान क्षेत्र के नोबेल पुरस्कार नहीं आ रहे हैं? इन सवालों के जवाब तलाशना इसलिए बेहद जरूरी है कि विज्ञान आधुनिक प्रगति की आधारशिला है। नतीजतन, जो देश विज्ञान को जितना महत्त्व देता है, प्रगति के उतने ही सोपानों पर आरूढ़ होता है। सत्रहवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद तो विज्ञान और विकास का रिश्ता समांतर हो गया। लेकिन इस रिश्ते की समानता कायम रखने में हम पिछड़ते जा रहे हैं और कोई भी देश विज्ञान तथा तकनीकी में पिछड़ कर वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना पूरा नहीं कर सकता।
’कैलाश बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली
सफाई से दूर
स्वच्छ भारत अभियान का सकारात्मक असर होता नहीं दिख रहा है। प्रधानमंत्री की ग्राम विकास की परिकल्पना के साथ अनेक सांसदों ने गांवों को गोद लिया था। लेकिन काम की व्यस्तता के कारण सांसद अपवाद को छोड़कर गांवों की सुध लेना तो दूर, उनकी शक्ल-सूरत भी नहीं देख पाए हैं। गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी विधायक और पंचायत के मुखिया आगे नहीं आते हैं। नतीजतन, बड़ी संख्या में गांवों की आज भी वैसी ही स्थिति है, जैसी आजादी के समय थी। विकास के नाम पर बहाए गए करोड़ों-अरबों रुपयों का हिसाब न देने वाले नेताओं ने क्या कभी देश की करुण स्थिति का मूल्यांकन किया है? आजादी के समय डॉलर और रुपया बराबर थे। लेकिन सरकार ने गरीबों के सिर अरबों-खरबों का कर्ज मढ़ दिया। नतीजे में डॉलर का मूल्य बढ़ता गया और 70 वर्ष की आजादी में 70 रुपए तक जा पहुंचा। भारत में बढ़ती गरीबी और रुपए के बढ़ते अवमूल्यन ने आम नागरिकों को कहीं का नहीं छोड़ा है।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत

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First Published on June 19, 2017 5:22 am

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