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शिक्षा पर बल

दिल्ली सरकार के बजट में शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता में सुधार के लिए भरपूर राशि आबंटित कर उपमुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया ने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।
Author March 20, 2017 05:50 am
परीक्षा में कम वक्त बचा है इसलिए भारी और बड़ी किताबें ना पढ़ें, इससे टाइम ज्यादा खराब होता है। इस दौरान अगर आपने बिपिन चंद्रा की इंडिया आफ्टर इंडिपेनडेंस या राम चंद्र गुहा की इंडिया आफ्टर गांधी जैसी किताबें पढ़ रखी है तो इन्हें दोबारा पढ़ने से बचे।

दिल्ली सरकार के बजट में शिक्षा के प्रसार और गुणवत्ता में सुधार के लिए भरपूर राशि आबंटित कर उपमुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया ने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। शिक्षा के बिना किसी भी देश या समाज के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। देश के सतत विकास के लिए शिक्षा पर ध्यान देना अत्यंत जरूरी है और सरकारें अपनी इच्छाशक्ति से शिक्षा को सुलभ बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। दिल्ली सरकार ने अड़तालीस हजार करोड़ रुपए के अपने बजट में ग्यारह हजार तीन सौ करोड़ की राशि शिक्षा पर खर्च करने की बात कही है। यह राशि अगले वित्त वर्ष में दस हजार स्कूली कमरों के निर्माण के अलावा नर्सरी शिक्षा, अर्ली चाइल्डहुड सेंटर्स, नए कॉलेज खोलने, पुस्तकालय, मिड-डे मील आदि पर खर्च की जाएगी। पिछले कुछ दशक से शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति बड़ी तेजी से बदली है जिससे शिक्षा क्षेत्र को काफी नुकसान हुआ है। स्कूलों के नाम पर बड़ी-बड़ी दुकानें उद्योगपतियों और नेताओं द्वारा शुरू कर दी गर्इं और इनके गठजोड़ के चलते सरकारी स्कूलों की दशा दिन पर दिन खराब होती चली गई। आम आदमी सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने में कतराने लगा और निजी स्कूलों की मनमानी सहने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं बचा। हालत जब और ज्यादा खराब हो गई जब राजनीतिक दल अपने एजेंडे का प्रचार करने के लिए शिक्षा तंत्र का प्रयोग करने लगे। दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों में सामाजिक भागीदारी तय करने के लिए सभी स्कूलो में मैनेजमेंट समितियों के जरिए समाज के लोगों और अभिभावकों को इस तंत्र से जोड़ कर स्कूलों में अनुकूल माहौल देने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में उनकी भूमिका तय की है। नियमित शिक्षक-अभिभावक बैठकों का आयोजन भी इसी क्रम में एक बेहतरीन कदम है।

‘आप जनता को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य दीजिए, देश अपना और समाज का विकास स्वयं कर लेगा’ ये अवधारणा शत-प्रतिशत सही है। इस वैश्विक युग में हमें प्रतियोगिता में बने रहने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता और प्रसार पर केंद्रित होना ही पड़ेगा। हमारे रंग-रंगीले लोकतंत्र में जहां राजनीतिक दल धर्म, जाति और क्षेत्र के चक्रव्यूह में जनता को फंसा कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं वहां किसी सरकार द्वारा जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान दिया जाना एक आशा जगाता है। बदलाव के लिए सिर्फ राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी भी उसमें अहम है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा-अनुकूल वातावरण और बेहतरीन पढ़ाई अगर संभव हो पाई तो यह निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि होगी।
’अश्वनी राघव, उत्तम नगर, नई दिल्ली

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