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दलितों के साथ

आज भी देशभर में दलितों का घोर उत्पीड़न हो रहा है। उनके अधिकारों में कटौती की जा रही है।
Author January 20, 2017 03:01 am
गुजरात के उना में दलितों की पिटाई वाले मामले में इस प्रकरण की जांच कर रही सीआईडी क्राइम ने बुधवार को अदालत में आरोप पत्र दायर कर दिया।

हमारे संविधान को लागू हुए सड़सठ वर्ष बीत गए हैं और इसके जरिए सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं चाहे वह अमीर हो या गरीब, कथित ऊंची जाति का हो या दलित। कोई किसी का शोषण नहीं कर सकता, किसी के अधिकारों को दबा नहीं सकता। सब आजाद हैं, कोई किसी का गुलाम नहीं। मुझे स्कूली शिक्षा तक तो यही सिखाया और पढ़ाया गया था लेकिन जब देश-दुनिया को जानने-समझने लगी तो अपने इस एकतासूत्र से बंधे समाज को बिल्कुल उलट स्थिति में पाया है जहां संविधान में दलितों के अधिकारों और बराबरी की बात तो दर्ज है लेकिन जमीनी सच कुछ और ही नजर आता है। आज भी देशभर में दलितों का घोर उत्पीड़न हो रहा है। उनके अधिकारों में कटौती की जा रही है। बहुत से गांवों और शहरों में संविधान में दर्ज मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी प्रावधानों को नकारते हुए ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत जारी है। देश के कई हिस्सों में दलित पीने का पानी उस हैंडपंप से नहीं ले सकते जिससे कथित सवर्ण लेते हैं।

हालत यह है कि उन्हें सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने, मंदिरों में प्रवेश और सार्वजनिक श्मशानों में दाह संस्कार तक से वंचित रखा गया है। सदियों से शिक्षा और ज्ञान के दरवाजे भी बंद रहे। यह स्थिति किसी न किसी रूप में आज भी बनी हुई है। उदारीकरण की नीतियों से विभिन्न क्षेत्रों में पूंजीपतियों, ठेकेदारों, माफियाओं का दबदबा बढ़ गया है। ऐसी परिस्थितियों में दलितों के पहले से खराब हालात और बदतर होते जा रहे हैं। सामाजिक बराबरी और सार्वजनिक सुविधाओं के लिए वे अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गंदी गालियों और शारीरिक हमलों का शिकार होना पड़ता है।
थानों में दर्ज दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखें तो हालात बहुत गंभीर नजर आते हैं। ऐसी बहुत सारी घटनाओं को तो दर्ज ही नहीं किया जाता। पुलिस सामंती मानसिकता के चलते कुछ आपराधिक घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय दलितों को डपट कर भगा देती है या मामलों को रफा-दफा कर देती है। समाज में अभी तक दलितों को न्याय पाने का अधिकार सिर्फ कानूनी पन्नों पर प्राप्त है। उन्हें न्याय के नाम पर सिर्फ शोषण मिलता है और हिम्मत हार कर वे या तो आत्महत्या करते हैं या मार दिए जाते हैं जिसका उदाहरण रोहित वेमुला और डेल्टा मेघवाल हैं।

हिंदुस्तान में लगभग सोलह फीसद दलित हैं यानी तकरीबन बीस करोड़। भारत में कुल आबादी लगभग 17.7 फीसद के दर से बढ़ी है जबकि दलितों की जनसंख्या लगभग 20.8 फीसद की दर से बढ़ी है। सवाल है कि फिर भी दलितों की गिनती समाज के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के रूप में क्यों की जाती है? उनका जीवन भी बेहतर हो, उन्हें भी पढ़ने-लिखने, समाज में आगे बढ़ने के मौके और समानता का अधिकार मिले। दलित युवाओं को भी आगे आकर अपना हक मांगना होगा वरना बीस करोड़ दलितों की आबादी वाले देश में सिर्फ दो-चार हजार सारी मलाई खाएंगे और बाकी सिर्फ ‘जय भीम’ का नारा लगाते रह जाएंगे।
’नीलम, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली

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