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परीक्षा की कसौटी

रमेश दवे के लेख ‘परीक्षा हो या ना हो’ (23 अगस्त) से सहमत होते हुए हम सिर्फ इतना और जोड़ना चाहते हैं कि किसी देश के विकास की पहली शर्त है वहां के नागरिकों का शिक्षित होना (सिर्फ साक्षर होना नहीं)..
Author September 8, 2015 16:39 pm

रमेश दवे के लेख ‘परीक्षा हो या ना हो’ (23 अगस्त) से सहमत होते हुए हम सिर्फ इतना और जोड़ना चाहते हैं कि किसी देश के विकास की पहली शर्त है वहां के नागरिकों का शिक्षित होना (सिर्फ साक्षर होना नहीं)। कहा जा रहा है कि आजादी के बाद पिछले सड़सठ सालों में देश की आबादी साढ़े तीन गुना से अधिक बढ़ने के साथ साक्षरता दर सोलह फीसद से बढ़ कर चौहत्तर फीसद हुई है। आंकड़े मन को आश्वस्त जरूर करते हैं लेकिन हकीकत यही है कि जिस देश में सबसे ज्यादा विद्वान और दार्शनिक हुए वहां शिक्षा की दुर्गति दिन-प्रतिदिन सबसे ज्यादा बढ़ती ही जा रही है। व्यापम घोटाला इसका ताजा उदाहरण है। एक समय वह था जब शिक्षा दान सबसे बड़ा दान माना जाता था पर आज वही शिक्षा महज व्यापार की वस्तु बन कर रह गई है। शहरों में बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूल और कोचिंग इंस्टीट्यूट कुकुरमुत्ते की तरह उगते दिखाई दे रहे हैं। इनकी देखा-देखी विश्वविद्यालय भी इस होड़ में शामिल होने को व्यग्र हैं।

यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली विश्वविद्यालय में एक के बाद एक नए पाठयक्रमों को शिक्षाविदों और छात्रों के साथ बिना आम सहमति बनाए हड़बड़ी में लागू कर दिया जाता है। ‘हम परिवर्तनकामी हैं’ यह सिद्ध करने के लिए युवाओं के भविष्य को दांव पर लगाया जा रहा है। सिर्फ इतना नहीं, पाठयक्रम लागू करने के बाद न तो समय से पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं और न नए पाठयक्रमानुसार मूल्यांकन पद्धति का दिशा-निर्देश स्पष्ट हो पाता है।

इन सबको देखते हुए ऐसा लगता है मानो वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का अर्थ अच्छे अंक लाने तक सिमट कर रह गया है। स्कूल-कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक को यही चिंता रहती है कि वहां का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत हो ताकि अपनी उपलब्धि गिना कर वाहवाही बटोरी जा सके। इसीलिए यहां शिक्षा की गुणवत्ता से ज्यादा ध्यान परीक्षा की कापी जांच में उदारता दिखाने में दिया जाता है। इतना ही नहीं, उच्च संस्थानों को तय किए गए नियमों को ताक पर रख कर अपने-अपने नियम-कायदे बनाने की पूरी छूट होती है। नतीजतन, संस्थानों में किसी पाठयक्रम में छात्रों की संख्या के मुकाबले प्राध्यापक उपलब्ध नहीं हो पाते तो कहीं प्राध्यापकों के मुकाबले में विद्यार्थी जुटाने की कवायद में संस्थान जुटा रहता है।

ऐसी स्थिति में परीक्षा मुक्त पाठयक्रम को सफल बनाना बेहद दुष्कर कार्य होगा क्योंकि परीक्षा मुक्त पाठयक्रम होने से न विद्यार्थी ज्ञान के प्रति उत्सुक होगा और न शिक्षक पढ़ाने के प्रति ईमानदार। वर्तमान समय में आखिर परीक्षा परिणाम ही तो शिक्षक और विद्यार्थी को परखने की एकमात्र कसौटी है।
विभा ठाकुर, रोहिणी, दिल्ली

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