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सुधार की दरकार

भारतीय मुसलिम समाज की तालीमी और सामाजिक हालात क्या है, यह किसी से छुपा नहीं है। हमारी अक्सरियत जाहिल और गरीब है।
Author नई दिल्ली | August 9, 2016 04:49 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (रॉयटर्स फाइल फोटो)

जुमे के दिन मेरे शहर मऊनाथ भंजन का माहौल ही अलग रहता है। लोग सुबह से नमाज पढ़ने के लिए तैयार रहते हैं और नमाज से आधा घंटा पहले ही मस्जिद चले जाते हैं। यह वह वक्त होता है जब शहर की औरतें बिना नकाब-बुरके के अपने घरों से निकल कर गली-मोहल्लों में घूमती हैं। यह वक्त बिना मर्दों की दुनिया का होता है, बिना पुरुषवादी प्रथाओं की दुनिया का होता है। इसे इस शहर में ‘जुमा खेलना’ कहा जाता है। पर अब धीरे-धीरे इसे भी ‘बिद्दत’ या गैर इस्लामी कह कर बंद किया जा रहा है। एक अजीब-सी नैतिकता मुसलिम समाज पर जबरन इस्लाम के नाम पर थोपी जा रही है। दरअसल, इस्लाम के नाम पर अरब संस्कृति को लादा जा रहा है जबकि गौर से देखा जाए तो इस्लाम की अपनी कोई संस्कृति नहीं है, न वेशभूषा, न खाना, न रंग। मुसलिम समाजों ने ये फैसले अपने स्थानीय वातावरण के आधार पर लिए हैं। सऊदी अरब में जब आम होता नहीं था तो वे खजूर खाते थे। नबी (स.अ.) हजरत मुहम्मद के सबसे बड़े दुश्मन ‘अबु जहल’ का भी लिबास वही था जो हमारे नबी (स.अ.) का था। आपको मध्य एशिया और रूस के मुसलिम इलाकों में अरबी नाम नहीं मिलेंगे और ये मुसलमान कोरमा-बिरयानी-सिंवई भी नहीं खाते। कहने का मतलब यह कि मुसलमानों की कोई इकहरी पहचान नहीं है। फिर भी हमारा मुसलिम समाज अरब संस्कृति को खुद पर लादे जा रहा है।

अभी हमारे आदर्श अरब देशों (विशेषत: सऊदी अरब) को बनाया जा रहा है। मुसलिम एकता/ इस्लामी हुकूमत का नारा बुलंद किया जा रहा है जिसे आंख बंद करके भारतीय मुसलिम समाज (विशेषत: मुसलिम युवा) माने जा रहा है। अरे भाई, तुम्हारी सोचने-समझने की ताकत खत्म हो गई है क्या? तुम्हें पचास से ज्यादा मुसलिम देश नजर नहीं आ रहे हैं। वे एक होकर क्यों नहीं इस्लामी हुकूमत बना लेते? वे सभी तो एक खुदा और एक रसूल को ही मानते हैं, फिर ऐसा क्यों नहीं हो रहा? तुम अपने गली-मोहल्लों में देखो, जब मुसलिम वहां एक नहीं हैं तो पूरी दुनिया में एक कैसे होंगे? आज राष्ट्र-राज्य का जमाना है भाई, अब मुसलिम पहचान इतनी बड़ी पहचान नहीं है जो एक राज्य बना दे। अगर मुसलिम पहचान ही काफी होती तो भारत से मुसलिम पहचान के नाम पर अलग हुए पाकिस्तान से (मुसलिम) बांग्लादेश अलग नहीं होता। आप सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और भारतीय मुसलिम समाज की अर्थव्यवथा में भी फर्क करना सीखो। वे अगर अपनी सभी औरतों को घरों में बंद कर देंगे तब भी उनके पास उन्हें खिलने और अय्याशी करने के लिए बहुत पैसा है। पर हमारे पास कोई तेल के कुएं नहीं हैं।

भारतीय मुसलिम समाज की तालीमी और सामाजिक हालात क्या है, यह किसी से छुपा नहीं है। हमारी अक्सरियत जाहिल और गरीब है। फिर भी अगर आप मुसलिम समाज की पचास फीसद आबादी को ‘लॉक’ कर देंगे तो आपका विकास कैसे होगा? चलो, दूसरी सूरत पर बात करते हैं। एक गरीब मां नकाब और बुरके की अनिवार्यता या शरायत के साथ अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मजदूरी कैसे करे? क्या इस्लाम खाए-पिए और अघाए हुए वर्ग के लिए है? हमारे मुसलिम समाज के धार्मिक और राजनीतिक रहनुमाओं ने कौन-सी रणनीति बनाई है जिस पर चल कर यह समाज अपनी गलाजत से निकल सके? हिंदुत्व (फासिस्ट ताकतों) को मुसलमानों का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले हमारे रहनुमाओं ने उससे लड़ने के लिए कौन-सी लोकतांत्रिक रणनीति समाज को दी है? कैसे हम इस खतरे का मुकाबला करें? क्या कोई तरीका है मुसलिम समाज के पास? दरअसल, हमारे रहनुमा (धार्मिक और राजनीतिक दोनों) सिर्फ जज्बाती बातों पर अपनी रोटियां सेंकने का काम करते हैं। इनके पास समाज की स्थिति को सुधारने की कोई रणनीति नहीं है। इसलिए ये समाज को तालीम, रोजगार और विकास जैसे मुद्दों से भटकाने के लिए बुरका, मदरसा, ईशनिंदा, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों में उलझाए रखते हैं। नीयत से ज्यादा हमें अपनी जेहनियत बदलने की जरूरत है। अल्लाह ताला खुद कुरआन की सूरा अर-राद में कहते हैं ‘..अल्लाह उन लोगों की दशा नहीं सुधारता जो स्वयं नहीं सुधरते’ (13:11)। (अब्दुल्लाह मंसूर, जामिया विश्वविद्यालय)
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अनुचित मांग
आरक्षण के हिमायती इसका दायरा बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर आवाजें उठा रहे हैं कि सेना में भर्ती के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। दरअसल, यह एक ऐसा अछूता क्षेत्र है जिसमें आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। सेना में भर्ती के कुछ नियम हैं जिनका पालन कड़ाई से होता है और होना भी चाहिए। इन नियमों के साथ समझौता करने का मतलब राष्ट्र की सुरक्षा से समझौता करना है। शारीरिक क्षमता, जिसमें लंबी दौड़ को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा करना, निर्धारित मानकों के अनुसार कद-काठी, न्यूनतम शैक्षिक योग्यता, प्रवेश-परीक्षा में सफलता आदि कुछ शर्तें हैं जिन्हें पूरा करने वाला ही सेना में भर्ती हो सकता है फिर चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, समुदाय अथवा वर्ग का क्यों न हो। आज यही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें आरक्षण नहीं है और होना भी नहीं चाहिए। मोटे तौर पर सेना में भर्ती का प्रधान आधार होता है बौद्धिक कौशल और शारीरिक क्षमता। आरक्षित अथवा दलित वर्ग से भी अगर कोई इन शर्तों को पूरा करता है तो भर्ती के सर्वथा योग्य है। मजबूत और बहादुर सेना के लिए भर्ती के नियमों का कड़ाई से पालन करना देशहित में बहुत जरूरी है। (शिबन कृष्ण रैणा, अलवर)
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कैसा निजाम
देश में बिजली-उत्पादन की स्थिति चमत्कारिक रूप से बेहतरीन होती जाने के कारण उसकी दरें गिरावट की ओर हैं। कई राज्यों में बिजली की दरें घटाई गई हैं। केंद्र सरकार लगातार दो-सवा दो रुपए प्रति यूनिट की दर पर राज्यों को बिजली बेचने को तैयार है। लेकिन उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें बढ़ा दी गई हैं। अखिलेश सरकार चार साल में सब मिलाकर बिजली 48.5 प्रतिशत महंगी कर चुकी है। यहां अब औसतन साढ़े सात रुपए प्रति यूनिट की दर है।
किसी भी अन्य प्रदेश में बिजली के दाम इतने ऊंचे नहीं, जितने उत्तर प्रदेश में हैं। इसकी मुख्य वजह यहां बिजली की भारी चोरी होना है, जिसे समाजवादी सरकार रोकने में नाकाम है। उत्तर प्रदेश में अब भी बाईस फीसद बिजली चुराई जाती है, जबकि बिजली चोरी का राष्ट्रीय औसत दस फीसद से कम है। बिजली चोरों के कुकृत्य का दंड लगातार ईमानदार उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। यह कैसा निजाम है? (अजय मित्तल, खंदक, मेरठ)

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