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चौपालः जाति की जड़ना

तमिलनाडु में अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़े को भरे बाजार में जाति-व्यवस्था के पोषकों ने अपना शिकार बना डाला। दलित पृष्ठभूमि से आने वाले शंकर की मौत हो गई और एक अति पिछड़ी जाति की कौशल्या बुरी तरह घायल हो गई।
Author March 23, 2016 03:48 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

तमिलनाडु में अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़े को भरे बाजार में जाति-व्यवस्था के पोषकों ने अपना शिकार बना डाला। दलित पृष्ठभूमि से आने वाले शंकर की मौत हो गई और एक अति पिछड़ी जाति की कौशल्या बुरी तरह घायल हो गई। भारत में आए दिन इस तरह की घटनाएं, खासकर उत्तर भारत के हरियाणा और दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में होती रहती हैं, जिन पर सरकार के कड़े-कानून भी बौने दिखते हैं। वास्तव में जाति-व्यवस्था भारतीय समाज की एक कड़वी सच्चाई है जो वर्ण-व्यवस्था के रूप में काफी पुरानी है। ‘मनु’ की सोच को चुनौती देने का उपक्रम किया जाता रहा है, लेकिन जहां प्रेम विवाह की बात आती है, वहां मानो समूची व्यवस्था उसी रूढ़िवादी वर्ण-व्यवस्था की समर्थक-सी दिखने लगती है।

तुलसी के ‘रामचरितमानस’ में भी कई जगह पर इस वर्ण-व्यवस्था का समर्थन है, लेकिन चूंकि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं, इसलिए किसी को इस पर आपत्ति नहीं होती। गांधी की रामराज्य-परिकल्पना में भी उस जाति-व्यवस्था को ही समर्थन मिलता है, यह बात अलग है कि दलितों को वे ‘हरिजन’ नाम देकर उनके प्रति अपनी संवेदनशीलता भी प्रकट करते हैं। लेकिन सवाल है कि अगर सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं तो फिर इस तरह का जातिगत-अलगाव क्यों!

निम्न कही जाने वाली जाति भी अपने नीचे कही जाने वाली कोई न कोई जाति खोज कर खुद को उच्च दिखाने का उपक्रम करती है। यह भावना जब तक है, तब तक इस ‘नासूर’ को भरने में मुश्किलें आती रहेंगी। शिक्षा का हथियार भी इस जड़ता को काटने में अपने आपको भोथरा महसूस करता है। शिक्षित व्यक्ति भी ‘प्रेम-विवाह’ के संबंध में अपनी बेटी या बेटा का विवाह निम्न कही जाने वाली जाति में करने से हिचकता है। हालांकि शहरों की तस्वीर सिर्फ दिखने में ही इन जड़ताओं से मुक्त लगता है, लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और है। ग्रामीण इलाकों में तो स्थिति और भयंकर है। एक शिक्षित व्यक्ति अगर चाहे तो भी जातिगत बंधनों से बाहर नहीं जा सकता। सामाजिक दबाव उसे ऐसा करने से रोकते हैं। हजारों साल पुरानी इस व्यवस्था को तोड़ने में और कितने साल लगेंगे! अब इस सवाल पर हमें सोचना ही होगा।
’अनीता यादव, दिल्ली विश्वविद्यालय

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  1. Birendra Chauhan
    Mar 23, 2016 at 3:00 am
    जीवन धर्म अर्थ काम एंव मोक्ष की ब्यवस्था बंधकर जीवन के बहुत सारे शारिरिक मानसिक सामाजिक राजनैतिक आर्थिक सांस्कृतिक दुखो से निपटने हेतु सुख हितो समाधान के लिए कुछ नियम पैमाने आदर्श या हकीकत का निर्माण की सोच समझकर नीव रखी है ,जीवन मे कभी कोई नियम अपने आप मे पूर्ण नही है कभी समता पर बिषमता हावी रहती है तो कभी बिषमता पर समता हावी । इसलिए समता बिषमता का बीच का पैमाना ठीक रहेगा, समता की आद्रशवादी सोच पूर्णतया समर्थन करने पर आप गफलत या ी का परिचय देकर उन्ही कमजोर लोगो की नजर मे गिर जाते हैं
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    सबरंग