December 02, 2016

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चौपालः रसोई पर मार

चना एक ऐसा कृषि उत्पाद है जिससे सबसे ज्यादा प्रकार के खाद्य पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। कच्चा चना सेंक कर होले के रूप में खाया जाता है तो हरे चने की सब्जी पसंद की जाती है।

Author October 29, 2016 01:44 am

चना एक ऐसा कृषि उत्पाद है जिससे सबसे ज्यादा प्रकार के खाद्य पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। कच्चा चना सेंक कर होले के रूप में खाया जाता है तो हरे चने की सब्जी पसंद की जाती है। सूखा चना अंकुरित कर सलाद की तरह, उबाल और भुन कर नाश्ते के तौर पर भी खाया जाता है। चना दाल को अकेले और अन्य दालों के साथ मिश्रित कर भी खाया जाता है तो मधुमेह के रोगियों को चने की मिश्रित रोटी भी सुझाई जाती है। इसके अलावा, इससे कई तरह की मिठाइयां और नमकीन बनाए और चाव के साथ खाए जाते हैं। मांगलिक और अन्य पारंपरिक आयोजनों-उत्सवों में और मेहमाननवाजी में इसका अपना विशेष महत्त्व अरसे से बना रहा है। चना के बारे में यह सब कहने का मतलब यह है कि अब तक चना दाल सब दालों से सस्ती रही है और इसी कारण इसका उपयोग किया जाता रहा है। ड्राइफ्रूट मिठाइयों, बंगाली मिठाइयों के दौर में तुलनात्मक रूप से चना दाल और बेसन के भाव कम रहने से इसे कम प्रतिष्ठा मिलती थी और उच्च-मध्य और संपन्नवर्गीय आयोजनों से इसकी मिठाइयां लगभग बहिष्कृत हो गई थी। अब साधारण लोगों के लिए दिवाली में ही इसकी जगह बची है। दिवाली पर्व पर घर-घर में चना और बेसन के उत्पादों की बहार आती रही है। लेकिन इस बार की दिवाली पर चना दाल और बेसन करीब डेढ़ सौ रुपए प्रति किलो और मूंगफली तेल डेढ़ सौ रुपए प्रति लीटर ने निम्न और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक संकट खड़ा कर दिया है। कुछ लोग भले मजाक में कह रहे हैं- ‘अबकी बार, चना दाल, बेसन, रसोई से बाहर’, लेकिन सच भी यही है।


आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जाने को देखते हुए अब तो ऐसा लगता है कि त्योहारों के मौसम और समारोहों में बेसन, बुंदी लड्डू, बेसन लड्डू, दिलजानी आदि चना दाल और बेसन के उत्पाद अपने भावों के चलते फिर से उच्च-मध्य वर्गीय आयोजन की ‘प्रतिष्ठा’ के प्रतीक बनेंगे। पिछले साल अरहर (तुअर) दाल को दो सौ रुपए प्रतिकिलो तक पहुंचा कर कुछ नीचे लाया गया था, लेकिन उसे अपने पुराने स्तर पर नहीं लाया गया है। अब यही खेल चना दाल के साथ खेला जा रहा है। वित्तीय पूंजी के भूमंडलीकरण और वायदा बाजार ने अंतरराष्ट्रीय सटोरियों के लिए जो मार्ग प्रशस्त किए हैं, उसमें आमजन का जीना दुश्वार हो गया है। कृषि उत्पादक के आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध, वायदा बाजार और जमाखोरी पर रोक के अलावा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक और मजबूत बना कर ही सबको राहत दी जा सकती है।
’सुरेश उपाध्याय, इंदौर, मप्र

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First Published on October 29, 2016 1:43 am

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