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बीमार सोच

तेलंगाना का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां के वरिष्ठ चिकित्सक ही मातृ एवं शिशु मृत्युदर कम करने के लिए विज्ञान पर भरोसा छोड़ पूजा-पाठ और कर्मकांड का सहारा ले रहे हैं।
Author August 14, 2017 06:25 am
दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती डेंगू से पीड़ित मरीज। (फाइल फोटो पीटीआई)

बीमार सोच
कल्पना कीजिए कि आप किसी अस्पताल में अपने सगे-संबंधी का इलाज कराने जाते हैं और पता लगता है कि अस्पताल के सभी चिकित्सक मरीजों को उनके हाल पर छोड़ पूजा-पाठ करने में व्यस्त हैं तो आपको कैसा लगेगा? जी हां, खबरों के अनुसार, हैदराबाद के गांधी अस्पताल में ऐसा ही कुछ चल रहा है। यह तेलंगाना का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां के वरिष्ठ चिकित्सक ही मातृ एवं शिशु मृत्युदर कम करने के लिए विज्ञान पर भरोसा छोड़ पूजा-पाठ और कर्मकांड का सहारा ले रहे हैं। दुख की बात है कि जहां पढ़े-लिखे लोगों में ही वैज्ञानिक सोच का अभाव है वहां हम कैसे कल्पना कर सकते हैं कि विकास से मीलों दूर बैठा आम आदमी अंधविश्वास और रूढ़िवाद के मायाजाल से बाहर निकल पाएगा?
अभी कुछ दिन पहले ही मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी अस्पतालों में ज्योतिषी नियुक्त करने का एलान किया जो मरीज की जन्म-कुंडली देख कर उसकी बीमारी बताएंगे और इलाज भी करेंगे। सवाल है कि क्या इस फैसले का कोई वैज्ञानिक आधार है? क्या ज्योतिष शास्त्र से रोग-निवारण पर शोध और प्रयोग विशेषज्ञों की देखरेख में किए गए हैं? अगर किए गए हैं तो उनका परिणाम और सफलता का प्रतिशत कितना रहा इसे सार्वजनिक करने की जरूरत है। ऐसे शोध और प्रयोगों में कौन-से मानकों को आधार बनाया गया है, यह भी देखा जाना चाहिए।

सरकारें और संस्थाएं यदि रूढ़िवाद, जड़ मान्यताओं और अंधविश्वास को बढ़ावा देंगी तो यह संविधान-विरोधी कृत्य होगा। संविधान में कहा गया है कि राज्य का एक प्रमुख कर्तव्य अपने नागरिकों में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना भी है। सरकार को चिकित्सा संस्थानों में चिकित्सकों और पैरामेडिकल्स के अभाव, जांच व अन्य कमियों को पूरा करने पर ध्यान लगाना चाहिए न कि ऐसी बातों को बढ़ावा देना चाहिए। अगर सरकारें ही ऐसे कदम उठाती हैं तो लगता है वे मान चुकी हैं कि सभी नागरिकों को बेहतर सुविधाएं देना उनके बस की बात नहीं और पार्टी एजेंडा उनके लिए जनता की जिंदगी से ज्यादा जरुरी है। बहरहाल, ऐसा नहीं है कि कहीं कुछ अच्छा नहीं हो रहा है। दिल्ली सरकार द्वारा नागरिकों के लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए उठाए जा रहे कदम एक आशा भी जगाते हैं।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तम नगर, नई दिल्ली
होड़ से परहेज
ऐसे मुद्दो को, जिनके बारे में आपकी जानकारी सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होती है, कृपया सोशल मीडिया पर साझा करने की होड़ से बचें। ‘झूठी खबरों’ के इस दौर में उन लोगों को कुछ अधिक सतर्क रहना होगा, जिन्होंने अपने परिश्रम से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की हैं। गोपनीय विषयों पर तो अंदाजा लगाने से हमेशा बचने की जरूरत है। इससे देश को लाभ के बजाय हानि भी हो सकती है।  मुझे एक हिंदी फिल्म का वह दृश्य याद है जिसमें लोगों के कहने से फिल्म का नायक शेर से भिड़ कर अपनी जान गंवा बैठता है। पहले ही किसी को महानायक न बनाएं। इतिहास पर गौर करें। नायक या महानायकों का फैसला उसे करने दें। हां, आप राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान देते रहें। सरकारें तो आती-जाती रहती हैं।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

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