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चौपालः राजनीति के रथी

जब तक कोई योद्धा रथ पर सवार नहीं होता तब तक वह रणभूमि में एक मामूली कार्यकर्ता की तरह झंडा-डंडा थामे एक मामूली सिपाही ही माना जाता है, लेकिन जैसे ही वह रथ की सीढ़ियां चढ़ जाता है ‘रथी’ होने के महान गौरव से भर उठता है। ‘
Author November 5, 2016 02:07 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

जब तक कोई योद्धा रथ पर सवार नहीं होता तब तक वह रणभूमि में एक मामूली कार्यकर्ता की तरह झंडा-डंडा थामे एक मामूली सिपाही ही माना जाता है, लेकिन जैसे ही वह रथ की सीढ़ियां चढ़ जाता है ‘रथी’ होने के महान गौरव से भर उठता है। ‘महारथी’ होने के उसके बहुत सारे रास्ते खुल जाते हैं। दरअसल, इस पुण्य-प्रतापी महाभूमि में प्राचीन काल से रथों का बड़ा महत्त्व रहा है। राजा-महाराजा रथों पर सवार होकर देशाटन को निकलते थे और अपनी प्रजा के दुख-दर्द से बावस्ता होते थे। उनकी कठिनाइयों और कष्टों को देख-समझ कर उनके निवारण के उपाय किया करते थे। अतीत हमेशा से वर्तमान की प्रेरणा बनता रहा है। इसी प्रेरणा की कोख से आधुनिक रथों का जन्म होता रहा है। विशेष रूप से जब-जब चुनावी बिगुल बजता है रणक्षेत्र में कुछ खास रथों के पहिये दौड़ने लगते हैं। प्रजातंत्र के ‘रथी’ अपनी गाड़ियों को ‘महारथों’ में रूपांतरित करने में जुट जाते हैं।


रथों पर सवार राजनीति का इतिहास बताता है कि इन पर सवार होकर कई महारथियों ने सत्ताओं के स्थापित शिखरों को ध्वस्त किया है और विजय पताकाएं फहराई हैं। चारों दिशाओं में ऐतिहासिक रथों के पहियों के अमिट निशान आज भी देखे जा सकते हैं। इसी तारतम्य में आया है उत्तर प्रदेश से ‘समाजवादी विकास रथ’। अब यह देखना तो बाकी है कि इससे प्रदेश में कितना समाजवाद बचेगा और कितना प्रजा का विकास हो सकेगा। बापू ने कहा था देश को समझना है तो रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में यात्रा करते हुए देशाटन करो। मगर अब तो तीसरा दर्जा ही नहीं रहा। वातानुकूलित पर्दों में कैद होकर कैसे दुनिया के कष्टों को अनुभव किया जा सकता है।

महात्माजी के संदेश के बाद देश की राजनीतिक गंगा में काफी पानी बह चुका है। देश और समाज ने खूब प्रगति की है। प्रजातंत्र के कर्णधारों को कोई कष्ट न पहुंचे इसलिए जनता के दुखों का जायजा लेने के लिए यात्रा पर निकलते नेताओं के रथों में दुनिया भर की सारी सुविधाएं होना तो लाजिमी हो ही जाता है। अन्यथा वे खुद यदि चिकनगुनिया की चपेट में आ गए तो फिर प्रजा के दुखों को दूर करना कैसे संभव हो पाएगा!
चिंता केवल इस बात की हो जाती है कि इन महारथियों के रथों का ‘स्टेयरिंग’ थामने के लिए अब कृष्ण की तरह कोई विचार सारथी दिखाई नहीं दे रहे।
’ब्रजेश कानूनगो, गोयल रिजेंसी, इंदौर

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