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चौपाल : बिगड़ती आबोहवा

पानी, वायु और ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने वाले तीन प्रमुख कारक हैं और इनके प्रदूषित होने के कारणों से हम सब भलीभांति परिचित हैं।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 23:48 pm
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विश्व पर्यावरण दिवस हमें पृथ्वी, प्रकृति, प्राणी, पानी, पवन, पर्यावरण के अंतर्संबंधों को समझने, जीवन के आधारभूत अवयवों की उपलब्धता और शुद्धता की स्थिति को परखने और उनके संचयन, संवर्धन, संरक्षण के लिए संकल्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के प्रति राजनीतिक और सामाजिक जागृति के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र द्वारा पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाए जाने की घोषणा 1972 में की गई थी पर अभी तक की उपलब्धियों का आकलन तो ‘ढाक के तीन पात’ उक्ति को चरितार्थ करता ही लगता है।

पानी, वायु और ध्वनि प्रदूषण पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने वाले तीन प्रमुख कारक हैं और इनके प्रदूषित होने के कारणों से हम सब भलीभांति परिचित हैं। असंगत औद्योगीकरण, बेतरतीब विकास, असीम लालच के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, शोषण और उसके पोषण, संरक्षण, संवर्धन, संचयन, पुनर्चक्रीकरण के प्रति घोर लापरवाही ने स्थितियों को विकराल रूप दिया है। ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत में छेद, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना-सिकुड़ना, वर्षा की अनिश्चितता, वायु में कार्बन की सघनता बढ़ना जैसी शब्दावली हम प्राय: देखते-सुनते हैं और इनके परिणामस्वरूप भीषण गर्मी, जल संकट, समुद्री तूफान आदि के साथ जल, वायु व ध्वनि प्रदूषण जनित रोगों की पीड़ भोगने के लिए हम सब अभिशप्त हैं।

1992 के रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) और जोहानिसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के विश्व पृथ्वी सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन के 21 सम्मेलन कोई सार्थक परिवर्तन नहीं ला सके हैं। दिसंबर 2015 के पेरिस सम्मेलन ने 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में बीस प्रतिशत कमी का लक्ष्य रखा है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र, जो सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जित करते हैं और विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दबाव बनाते हैं, निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में और विकासशील राष्ट्रों की प्रगति में बाधक ही सिद्ध हो रहे हैं।

घटते वन, प्राकृतिक व पारंपरिक जल संरचनाओं के अस्तित्व-संकट के प्रति शाब्दिक चिंताओं और नदी रेत व खनिज संसाधनों के वैध-अवैध बेतरतीब दोहन ने वन्य जीवों, जलचरों, पक्षियों के अस्तित्व का संकट उत्पन्न करने के साथ विषमता की खाई बढ़ाते हुए जंगल व प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर जनजातीय समाज के जीवन, संस्कृति तथा समूची मानव जाति के समक्ष गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। वन, वन्यजीव, जनजातीय जीवन, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों-नियमों के क्रियान्वयन के प्रति अगंभीरता और नियंत्रक संस्थाओं की विफलताओं ने करेले की बेल को नीम पर चढ़ाने का काम किया है। इस सबके मद््देनजर आवश्यक है कि हम सरकारों पर दबाव बनाने के साथ वर्षा जल को सहेजने और पौधारोपण में व्यक्तिगत स्तर पर भी अपनी जिम्मेदार भूमिका का निर्वाह कर पर्यावरण संतुलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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