December 07, 2016

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चौपालः देश के लिए

इसे मौजूदा समय की महज एक कहानी के एक प्लॉट के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन गली-मुहल्लों में जो हालत है, उसमें अगर किसी को यह सच के करीब लगे तो उसे खारिज करना मुश्किल होगा।

Author November 26, 2016 02:34 am
हजार रुपए का नोट।

इसे मौजूदा समय की महज एक कहानी के एक प्लॉट के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन गली-मुहल्लों में जो हालत है, उसमें अगर किसी को यह सच के करीब लगे तो उसे खारिज करना मुश्किल होगा। एक रात जब देश सोने की तैयारी कर रहा था, उस वक्त देश के आला अधिकारी ने बड़े नोटों को बंद करने का ऐलान कर दिया, जिसे देशहित में बताया गया। अगले दिन सुबह बैंक बंद, दो दिन एटीएम बंद। रातोंरात मेहनत से कमाया पैसा कागज के टुकड़े बता दिए गए। कबीर ने सोचा कि चलो, दो दिन की बात है, बदल लेंगे। एक नहीं पूरे पचास दिन हैं, धीरे-धीरे बदल लेंगे। तब तक घर में रखी गुल्लक से काम चला लेते हैं। लेकिन अब इतने दिन के बाद भी नोट की शक्ल तक नहीं देखी और चिल्लर भी खत्म। कबीर रोजाना बैंक की लाइन में जाता और अपनी बारी के आने से पहले ही बैंक में नकदी खत्म होने की बात सुन निराश वापस आ जाता। घर में बीमार मां है, जिसका अभी कुछ दिन पहले आॅपरेशन हुआ है। दवा के लिए पैसे जरूरी हैं, स्कूल की फीस नहीं गई, स्कूल के तकादे। अभी तक घर का किराया भी नहीं दिया। बैंक जाने के चक्कर में काम पर भी नहीं गया था कबीर।

गांव से आए पांच साल हो चुके थे, लेकिन खाता न खुल सका था। बैंक वालों ने खाता खुलवाने के दौरान न जाने कैसे-कैसे नियम बता कर खाता नहीं खोला था। बीवी ने समझाया कि तुम काम पर जाओ मैं जाकर लाइन में लग जाऊंगी। बच्ची छोटी है तो क्या हुआ! घर में मरीज है तो क्या हुआ! किसी न किसी को तो बैंक जाना होगा, अगर घर का खर्च चलाना है तो। ईमानदारी का पर्व है, पूरा देश मना रहा है तो हम क्यों न मनाएं! अगले दिन भोर में ही विमला अपनी बच्ची को गोद में ले बैंक की कतार में लग गई। उधर कबीर अपने काम पर चला गया। पर काम ही कहां था बाजार में! जब तक ठेकेदार के पास नए नोट नहीं होंगे, वह कैसे काम कराता या फिर पुराने नोट के बदले काम कराने को कहता? मजबूरी में नए नोट न सही तो पुराने ही सही, पैसे तो चाहिए ही। इधर विमला बैंक की कतार में थी… सुबह से कुछ खाया भी न था, बच्ची भी भूखी थी। लेकिन देने के लिए पास में कुछ नहीं था। घर में भी राशन नहीं था कि सबको बना के खिलाती। भीड़ इतनी, जितनी भगवान के दर्शन के लिए भी न हो। मानो सभी इस पर्व में शरीक हों।

एक आस थी कि कुछ घंटों बाद ही सही, ये पैसे तो बदल ही जाएंगे। कुछ दिन तो उधार भी चला लिया। पर रोज-रोज तो कोई नहीं दे सकता। तभी खबर मिली कि बैंक में राशि खत्म हो गई है। राशि न होने से भीड़ में आक्रोश पैदा हो गया, भगदड़ मच गई, विमला के हाथ से बच्ची छूट गई और छूटते ही बच्ची भीड़ से कुचल गई और हमेशा के लिए खामोश हो गई। अब उसे भूख नहीं लग रही थी। टीवी की आवाज अब भी आ रही थी- ‘दो-चार दिन की परेशानी है। बॉर्डर पर भी तो सेना जान गंवा देती है देश के लिए..!’
’आरिफा एविस, दिल्ली

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First Published on November 26, 2016 2:32 am

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