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चौपाल: किसानों का कौन

भयंकर सूखे की मार झेल रहे इन किसानों के पास अपनी मांगें सरकार के पास पहुंचाने का कोई और सस्ता तरीका है भी नहीं।
Author नई दिल्ली | April 4, 2017 06:14 am
प्रतीकात्मक चित्र

अश्वनी राघव, उत्तम नगर, नई दिल्ली

जंतर मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर रहे तमिलनाडु के किसानों की तस्वीरें आजकल अखबारों की सुर्खियों में हैं भले ही उनके विरोध-प्रदर्शन के अनोखे तरीके के कारण ही क्यों न हों। भयंकर सूखे की मार झेल रहे इन किसानों के पास अपनी मांगें सरकार के पास पहुंचाने का कोई और सस्ता तरीका है भी नहीं। कभी वे सूखे के कारण आत्महत्या कर चुके अपने संबंधियों के नरमुंड के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं तो कभी सांप और चूहे मुंह में रख कर फोटो खिंचवा रहे हैं। उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ अपनी बात सरकार तक पहुंचाना है तरीका चाहे कोई भी हो। इस मुहिम में धीरे-धीरे अन्य लोगों का भी उन्हें साथ मिल रहा है जिनमें छात्र भी शामिल हैं।

तमिलनाडु में एक सौ चालीस वर्षों के बाद इतना भयंकर सूखा पड़ा है जिसके चलते छोटे और मंझोले किसानों के लिए अपना परिवार पालना भी मुश्किल हो चला है। रही-सही कसर लिए हुए कर्ज के बढ़ते ब्याज ने पूरी कर दी है। किसान गांव छोड़ शहरों में दिहाड़ी-मजदूरी करने पर मजबूर हैं और इनमें पढ़े-लिखे युवा भी शामिल हैं। स्कूल-कॉलेज की फीस न भर पाने के चलते और परिवार पर आए जीवन-मरण के संकट से जूझने के लिए उन्हें पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी करने पर विवश होना पड़ रहा है। सरकार द्वारा जो राशि राहत के लिए आबंटित की गई है वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है जिसे बढ़ाने के अलावा कर्ज माफी और नदियों को जोड़ने की मांग की मांग ये किसान कर रहे हैं। कर्ज लेकर दिल्ली पहुंचे ये किसान लगभग बीस दिन से जंतर मंतर पर डेरा जमाए हैं और आर-पार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

कुछ दिन पहले आई नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में तीस फीसद ग्रामीण परिवारों पर औसतन एक लाख तीन हजार रुपए का कर्ज है। दूसरी ओर लगभग बाईस फीसद शहरी परिवार औसतन लगभग सैंतीस लाख रुपए के कर्जदार हैं। ग्रामीण इलाके के छोटे किसानों को ब्याज और मूल चुकाना टेढ़ी खीर हो रहा है। सूखे के कारण जहां एक ओर फसल बर्बाद हो गई वहीं दूसरी ओर लिए गए उधार का ब्याज प्रतिदिन बढ़ रहा है। जाहिर-सी बात है कि बैंक में खाता न होने की स्थिति में छोटे किसानों ने गांव के साहूकारों से ही ब्याज पर रकम ली होगी। ऐसे में किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तो उनके सामने परिवार के भरण-पोषण का सवाल उठ खड़ा हुआ है वहीं दूसरी ओर उनका कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। बढ़ते आर्थिक संकट के चलते मजबूरन कई किसान आत्महत्या भी कर चुके हैं और किसानों की यह समस्या देशव्यापी है। बीते कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य राज्यों में भी सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

बढ़ते कर्ज के अलावा भी कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका सरकार के मामूली हस्तक्षेप से हल निकल सकता है पर सरकार इन मुद्दों पर भी गंभीर नजर नहीं आती। इन समस्याओं में खाद की उपलब्धता न होना, फसल का उचित मूल्य न मिल पाना, बाबुओं की रिश्वतखोरी आदि शामिल हैं। मौजूदा सरकार के सभी नियम मध्य और उच्च वर्ग को केंद्र में रख कर बनाए जा रहे हैं जबकि सरकारों को नियम और कानून बनाने से पहले सभी वर्गों की जरूरतों का ध्यान रखने की आवश्यकता है। भारत शुरू से ही कृषि-प्रधान देश के रूप में जाना जाता रहा है। कहीं ऐसा न हो कि गलत नीतियों के चलते अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे ये किसान हाशिये पर रह जाएं जिसका नुकसान हम सभी को होने वाला है।

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