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चौपालः आस्था बनाम कट्टरता

ज्ञान, अंधविश्वास और आस्था को जांचने की कसौटी तर्क है। जो तर्क से सिद्ध हो जाए उसे ज्ञान और जो तर्क से सिद्ध न हो उसे अंधविश्वास कहते हैं।
Author July 27, 2016 02:22 am

ज्ञान, अंधविश्वास और आस्था को जांचने की कसौटी तर्क है। जो तर्क से सिद्ध हो जाए उसे ज्ञान और जो तर्क से सिद्ध न हो उसे अंधविश्वास कहते हैं। लेकिन जिसे तर्क से न सिद्ध किया जा सके और न असिद्ध किया जा सके उसे ‘आस्था’ कहते हैं। जैसे, कोई कहे कि सूर्य नमस्कार करने या नमाज पढ़ने से उसके मन को बहुत शांति मिलती है। अब इस बात को न साबित किया जा सकता है न खारिज किया जा सकता है। यहां प्रश्न उठता है कि फिर आस्था और कट्टरता में क्या अंतर है? तो इसका उत्तर है कि आस्था और कट्टरता में जमीन-आसमान का फर्क है। आस्था वह मान्यता है, जिस पर कोई व्यक्ति पूरी दृढ़ता से विश्वास करता है पर आस्था, तार्किकता-अतार्किकता से परे होती है। आस्था से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है, उसे आंतरिक शांति मिलती है।

इसके विपरीत कट्टरता, अंधश्रद्धा पर आधारित होती है। कट्टरता से बौद्धिक विकास बाधित होता है। आस्था व्यक्ति को आत्मविश्वास देती है। कट्टर व्यक्ति अपने नेता का बौद्धिक गुलाम होता है। अरबी में धार्मिक आस्था के लिए ‘ईमान’ शब्द प्रयुक्त होता है, जिसका अर्थ है वह जो आदमी को सुरक्षा का भाव दे। कट्टर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और इसलिए वह कोई तर्क सुनना ही नहीं चाहता। जिस व्यक्ति में असुरक्षा का भाव और आत्मविश्वास की कमी जितनी अधिक होती है, वह उतना ही कट्टर होता है। आस्थावान व्यक्ति, ज्ञानी और परिपक्व होता है जबकि कट्टर व्यक्ति, अज्ञानी और अपरिपक्व।

वर्तमान समय में धार्मिक आस्था की जगह कट्टरता ने ले ली है। जिस व्यक्ति, संगठन या स्वघोषित इस्लामी देश को अपनी सत्ता और शक्ति कमजोर होती दिखती है, वह इस्लाम का नारा बुलंद करने लगता है और मुस्लिम समाज का एक वर्ग धर्मांधता के कारण इसे स्वीकार भी कर लेता है। यह वर्ग कुछ भी ऐसा पढ़ना-लिखना नहीं चाहता जो स्थापित मान्यताओं के खिलाफ हो। अगर कोई इन स्थापित मान्यताओं के खिलाफ लिखता-बोलता है तो पहले उसे अपने ऊटपटांग तर्कों से समझाने की कोशिश की जाती है, फिर उसे उसके ईमान का वास्ता दिया जाता है। जब इससे भी बात नहीं बनती तो उस पर व्यक्तिगत आरोप लगाया जाता है ताकि उस व्यक्ति की बातों का असर मुस्लिम समाज पर न पड़े।

उसे इस्लाम का दुश्मन कहा जाता है, आरएसएस का एजेंट कहा जाता है और अंतिम ब्रह्मास्त्र के रूप में यहूदियों का एजेंट बोला जाता है (बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में तो हत्या भी कर दी जाती है)। यह उस धार्मिक समाज का हाल है जिसके पवित्र मजहबी ग्रंथ ‘कुरान’ की पहली आयत का जोर ‘इकरा’ (पढ़ने) पर है। पढ़ने-लिखने पर इतना जोर शायद इसलिए दिया गया है कि आगे चल कर ईमान वालों का जो समाज विकसित हो वह तलवार की जगह कलम से किसी व्यक्ति या विचार की मुखालफत करे।

यहां यह बताना जरूरी है कि अपनी स्थापना के कई सौ सालों तक इस्लाम की उदारता और अरबी भाषा के कारण ही पश्चिम को यूनानी फलसफा और ज्ञान हस्तांतरित हो सका वरना यूरोप में ‘डार्क एज’ पता नहीं कब तक चलती। वाजिब सवाल यह है कि जब इस्लाम की शुरुआती शताब्दियों में मुसलमान समाज इतना उदार था कि दर्शन और ज्ञान के हर स्रोत को खंगाल रहा था तो बाद की शताब्दियों में यह परंपरा बंद क्यों हो गई? इसके जिम्मेदार कुरान, हदीस के वे व्याख्याकार (आलिम) थे और आज जाकिर नाइक के रूप में हैं जिन्होंने मुस्लिम समाज को जड़ता की गहराइयों में ढकेल दिया। आज जरूरत इस बात की है कि इस्लाम की सही उदारवादी व्याख्या से इन आलिमों की क्रूरतापूर्वक व्याख्या को गैरइस्लामी और गुनाह सिद्ध किया जाए ताकि ये गुनहगार ‘खुदाई खिदमतगार’ होने का ढोंग बंद करें!
’अब्दुल्लाह मंसूर, जामिया विश्विद्यालय

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