May 29, 2017

ताज़ा खबर

 

चौपालः सच की सजा

जवानों को घटिया खाना देने का वीडियो वायरल कर सुर्खियों में आए सीमा सुरक्षा बल के कांस्टेबल तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया गया।

Author April 22, 2017 03:40 am
बीएसएफ के जवान तेज बहादुर यादव (Source: Facebook)

कवि कमलेश शर्मा की पंक्तियां हैं- ‘जो सांसें लीं सदा वे स्वाभिमानाधीन लीं/ पर एक एक करके आज सारी बीन लीं/ बस था गुनाह मेरा बात की थी दाल की/ पर आपने हमारी रोटियां ही छीन लीं।’ जवानों को घटिया खाना देने का वीडियो वायरल कर सुर्खियों में आए सीमा सुरक्षा बल के कांस्टेबल तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया गया। देश को खूब बुरा लगा जब हमारे फौजी जवान कुछ कश्मीरी अलगाववादियों से मार खाते एक वीडियो में दिखे। बुरा लगना उचित था और स्वाभाविक भी। पर जब देश के हुक्मरानों के हाथों, देश के फौजी मार खा गए तो देश ने चुप्पी क्यों साध ली? सिपाही तेज बहादुर यादव ने सिस्टम से मुंह की खाई तो हमें बुरा क्यों नहीं लगा? तेज बहादुर यादव ने किसके लिए इतना बड़ा खतरा मोल लिया? क्या सिर्फ अपनी थाली के लिए? या सिर्फ सहकर्मी जवानों के हक के लिए? या पूरे देश की आत्मा, उसके स्वाभिमान के लिए?

तेज बहादुर यादव ने किसके दम पर यह आवाज बुलंद की थी? हमारे दम पर, देश के अवाम के दम पर, देश के जुल्म न सहने के अक्सर सुने जाने वाले संकल्प के दम पर। सोचा होगा, हम जिंदा कौम हैं, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएंगे! ऐसी आवाज उठाएंगे कि हकमारी करने वाले सहम जाएंगे। पर जब तेज बहादुर यादव को बर्खास्त कर दिया गया तो क्या हमें बुरा लगा? हम तो उस मुद्दे से थक चुके थे। मीडिया की भांति उससे हट कर दूसरे मुद्दे, दूसरे ब्रेकिंग न्यूज पर आ चुके थे। कुछ वीडियो को नकली, तो तेज बहादुर को कांग्रेस का एजेंट, विपक्ष की चाल या मोदीजी को बदनाम करने की साजिश मान चुके थे। सचमुच वे दूसरी मिट्टी से ही बने भारतीय रहे होंगे जो बर्बर, क्रूर अंग्रेजों से ही भिड़ गए। हम तो अपने रक्षकों को ही इंसाफ दिलवाने के लिए अपने अफसरों और सिस्टम से भी लोहा नहीं लेना चाहते!

दरअसल, तेज बहादुर यादव को जिस बात का डर था, आखिर वही हुआ। उसे डर था कि सच बोलने की सजा मिलेगी। किसी भी एजेंसी में भ्रष्टाचार अत्यंत संगठित होता है। वह अपने भीतर के किसी शिकायती को बच कर जाने नहीं दे सकता। तेज बहादुर जानता था, इसलिए उसने देशवासियों से अपील की थी। उसने सोचा होगा कि सैनिकों की जयजयकार करने वाली जनता उनके हालात जानती नहीं है। जान जाएगी तो जरूर साथ खड़ी होगी। उसने यह नहीं सोचा था कि जनता जान पर खेलने वालों की जयकार उनकी बहादुरी के लिए नहीं करती। इसलिए करती है कि उसकी खुद की जान बची रहे। वह भला एक शिकायती सिपाही के लिए अपनी नींद में खलल क्यों डाले? बीच-बीच में जांच के नाम पर चल रही उत्पीड़न की खबरें मिलती रहीं। उसकी पत्नी का रोता-बिसूरता चेहरा कभी-कभी दिखता रहा।

लेकिन तेज बहादुर अब भारत मां का वीर सिपाही नहीं रह गया था। वह घटिया दाल-रोटी की शिकायत करने वाला कार्टून बन चुका था। एक तरह से देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका था! वह हंसते-हंसते शहीद हो जाने वाला सैनिक नहीं रह गया था। यानी जनता को शहीद की अंतिम यात्रा में शामिल होने के गौरव का अहसास दिलाने वाला योद्धा नहीं रह गया था। लेकिन बर्खास्त होकर भी तेज बहादुर देश की छाती पर कुछ सवाल छोड़ गया है। केवल सैनिकों को मिलने वाली घटिया दाल-रोटी और एजेंसियों के भीतर के भ्रष्टाचार का सवाल नहीं। उससे भी बड़ा यह सवाल कि अगर सुरक्षा एजेंसियां अपने ही एक शिकायती सदस्य को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं तो उनसे ‘डिस्टर्बड’ इलाकों की विद्रोही जनता की कैसी देखभाल की उम्मीद की जा सकती है!
’देवेंद्रराज सुथार, बागरा, जालोर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on April 22, 2017 3:40 am

  1. No Comments.

सबरंग