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चौपाल : आगे बढ़ती बेटियां

पिछले दिनों आए परीक्षा परिणामों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों को कहीं ज्यादा सफलता मिलने का तथ्य सुखद और महत्त्वपूर्ण है।
Author नई दिल्ली | June 1, 2016 22:47 pm
स्टूडेंट्स

पिछले दिनों आए परीक्षा परिणामों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों को कहीं ज्यादा सफलता मिलने का तथ्य सुखद और महत्त्वपूर्ण है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के बारहवीं के नतीजों में उनका उत्तीर्ण प्रतिशत लड़कों से दस अंक ज्यादा है, मेरिट सूची में पहले तीन स्थानों पर लड़कियां हैं, और समाज में सबसे रुतबेदार मानी जाने वाली यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में भी एक लड़की शीर्ष पर रही है। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर कृष्ण कुमार की किताब ‘चूड़ी बाजार में लड़की’ बताती है कि समाजीकरण की प्रक्रिया लड़कियों के लिए लड़कों से किस तरह भिन्न होती है और उनके जन्मजात नैसर्गिक गुणों और प्रतिभा के विकास को किस तरह बाधित करती है। लेकिन यह सुखद है कि समाज में इस संदर्भ में बदलाव हो रहा है और लड़कियों की नई पीढ़ी बेहतर माहौल में पल-बढ़ रही है।

समाज में शिक्षा का बढ़ना एक कारण हो सकता है, क्योंकि शिक्षित मां-बाप लड़कियों को पढ़ा-लिखा रहे हैं और लड़के-लड़की के बीच कम भेदभाव करते हैं। इसके अलावा बालिका शिक्षा और ‘जेंडर’ के मुद्दों पर सरकारी-गैर सरकारी प्रचार-प्रसार भी एक कारक हो सकता है। पहले समाज में यह सोच थी कि लड़कियां नैसर्गिक तौर पर लड़कों से कमतर होती हैं। लेकिन जो परिणाम सामने हैं उनसे साबित होता है कि यदि उचित परिवेश और अवसर मिलें तो वे हर क्षेत्र में न केवल लड़कों की बराबरी कर सकती हैं, बल्कि उनसे कहीं बेहतर कर सकती हैं। ऐसे उदाहरण देशभर में, हर प्रदेश में, स्कूल के स्तर पर और परिवार के भीतर भी दीखते हैं।

ऐसे ही एक और बात ध्यान खींचती है। लड़कियों की तरह ही समाज के कम साधन संपन्न परिवारों और उपेक्षित वर्ग के बच्चों ने महत्त्वपूर्ण सफलताएं पाई हैं। दसवीं या बारहवीं के बोर्ड परिणाम हों, तकनीकी-व्यावसायिक संस्थानों में दाखिले की प्रवेश परीक्षा हो या रुतबेदार सरकारी-गैर सरकारी नौकरियां, उनके द्वारा सफलता के झंडे गाड़े जा रहे हैं। हमारे शहर से दो साल पहले तेईस वर्ष की एक लड़की ने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में 165 वां स्थान पाया था। उसके पिता स्कूल शिक्षक हैं और दादा जिस स्कूल में हम पढ़ते थे वहां माली थे। उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली है और स्वभाव सरल। हिमाचल प्रदेश के एक बस कंडक्टर की बेटी 2012 बैच की आईपीएस है। उसके बारे में मैंने पढ़ा था कि वह आम व्यक्ति की तरह बस-आॅटो में सफर करती है। इन दिनों बोर्ड परीक्षाओं में भी मजदूर, छोटे किसान, ठेले पर फल/ सब्जी बेचने वाले और ऐसे ही अन्य परिवारों के बच्चों के नाम अखबारों में देखे जा सकते हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद समाज में अभी लड़कियों, निर्धन या वंचित वर्ग के बच्चों के साथ अनेक बाधाएं हैं। एक तरह से जो सफलता वे हासिल कर रहे हैं, विपरीत हालात में, बाधाओं से जूझ कर पा रहे हैं। उदाहरण के लिए, लड़कियों को पढ़ाई के साथ ही घर के काम करने पड़ते हैं और घर से बाहर निकलना उनके लिए कठिन होता है, खासकर जब छेड़छाड़ और यौन अपराध की घटनाएं बढ़ रही हैं। निर्धन और दलित पृष्ठभूमि के बच्चों को भी कठिन संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि जैसे स्कूल में वे पढ़ते हैं, परिवार का जो माहौल होता है, माता-पिता अनपढ़ होने से जो कमी रहती है, कोचिंग, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि तक उनकी पहुंच- ऐसी अनेक बातें हैं जो उनके लिए बाधा दौड़ जैसी ही होती होंगी

(’कमल जोशी, अल्मोडा, उत्तराखंड)

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