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योग्यता की तलाश

जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: वाराणसी की एक घटना यह सिद्ध करती है कि हमारे देश में पठन-पाठन का माहौल किस प्रकार बिगड़ चुका है, सहायक शिक्षा निदेशक के निरीक्षण के दौरान हेड मास्टर साहब कक्षा आठ का सवाल हल नहीं कर पाएं। हालांकि बाद में उसी कक्षा के एक छात्र ने सवाल हल कर दिया। […]
Author October 22, 2014 10:15 am

जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: वाराणसी की एक घटना यह सिद्ध करती है कि हमारे देश में पठन-पाठन का माहौल किस प्रकार बिगड़ चुका है, सहायक शिक्षा निदेशक के निरीक्षण के दौरान हेड मास्टर साहब कक्षा आठ का सवाल हल नहीं कर पाएं। हालांकि बाद में उसी कक्षा के एक छात्र ने सवाल हल कर दिया। बावजूद इसे हेड मास्टर साहब की योग्यता पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता। क्योंकि मास्टर साहब की काबिलियत पर सवाल उठाने के पहले हमारी पूरी शिक्षा-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो जाएंगे। जिसका जवाब देना मुश्किल है।

 

प्रश्न यह नहीं कि मास्टर साहब सवाल को हल क्यों नहीं कर सके, क्योंकि गणित जैसे दुरूह विषय में इसके विशेषज्ञ से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सभी प्रश्नों को हल कर देगा। इससे कहीं गंभीर सवाल है कि क्या कभी सरकारों ने यह जानने का प्रयास किया कि देश में ऐसे कितने शिक्षक हैं, जो पढ़ने-पढ़ाने से पूर्णत: विरक्त हो चुके हैं। यह ऐसा प्रश्न है जिस पर विमर्श की सर्वाधिक आवश्यकता है।

 

अगर हमारे देश के शिक्षक अपने विषय में पारंगत होने के बावजूद अंतिम परीक्षा में विफल सिद्ध हो रहे तो यकीनन इन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए कड़ाई स्वाभाविक है। आखिरकार सरकारें अपने शिक्षकों पर भारी-भरकम राशि किसलिए खर्च कर रही हैं। यह हमारी शिक्षा-व्यवस्था की कैसी विडंबना है कि जो वर्ग दूसरों को नैतिक शिक्षा, ज्ञान और उपदेश देता रहा है, आज वह अपने पथ से विचलित हो चुका है। इसके विचलन को रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर जो दिशा-निर्देश दिए हैं उसका संतोषजनक पालन तो हो रहा है।

 

लेकिन इससे समाज को वह फायदा नहीं मिल रहा है, जो मिलना चाहिए। कानून के डर से शिक्षक छात्रों पर किसी प्रकार की कड़ाई से परहेज करने लगे हैं। जिसका कहीं न कहीं पठन-पाठन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। कुछ शिक्षण संस्थान बायोमीट्रिक प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं ताकि शिक्षकों के आने और जाने के समय पर सटीक निगाह रखी जा सके। उद्देश्य यही है कि शिक्षक निर्धारित समय तक संस्थान में उपस्थित रहें। यह प्रणाली उन शिक्षकों पर भारी पड़ रही है, जो केवल हाजिरी बनाने संस्थान में आते थे। या थोक भाव में हाजिरी बनाने की कला में पारंगत हो चुके थे।

 

प्रश्न है कि जो शिक्षक सिर्फ हाजिरी के लिए संस्थान आते रहे हैं उनसे कायदे से पढ़ाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) से संबद्ध संस्थानों में सीसीटीवी कैमरा लगाने की कवायद हो रही है। ताकि शिक्षक-छात्र के पल-पल की गतिविधियों की मानिटरिंग की जा सके। कुल मिला कर इन उपायों से निष्कर्ष निकलता है कि कुछ शिक्षक किस तरह इस पवित्र पेशे को बदनाम कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो शिक्षण संस्थानों को सीसीटीवी कैमरे और बायोमीट्रिक मशीन लगाने की नौबत नहीं आती। शिक्षक मजदूर नहीं है। वह समाज और राष्ट्र को सही दिशा में त्वरित करने वाला ज्ञानी दाता है।

 

दुर्भाग्य से शिक्षक की यह तस्वीर धुंधली होती जा रही है। लेकिन जब हम तस्वीर का दूसरा रूप देखते हैं तो आश्चर्य होता है। विश्व में विशेष रूप से यूरोपीय देशों में भारतीय शिक्षकों की सर्वाधिक मांग है। भारतीय मूल के सत्ताईस वर्षीय गणित शोध कर्ता हिमांशु असनानी को अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी का प्रतिष्ठित अवार्ड दिया गया है, ऐसे और बहुत से उदाहरण हैं।

 

जाहिर है कि हमने शिक्षा-व्यवस्था में जिस पथ को आत्मसात कर लिया है उससे न तो खुदा मिला है और न ही विशाले सनम। शिक्षक ही विचलित नहीं है, बल्कि शिक्षा का पूरा तंत्र दिशाहीन हो चुका है। कोई कारण नहीं कि अगर हमारे शिक्षक सपर्पित भाव से पढ़ाने की ठान लें तो भारत को शिक्षा का केंद्र बनने में अधिक समय लगे! देश के नीति-नियंताओं को समझने की आवश्यकता है कि भारत से जाने वाली मेधाएं विदेशों में सम्मानित होती हैं। लेकिन हम अपने घर में उनकी हैसियत दो कौड़ी की भी नहीं समझते। आखिर यह वक्त कब आएगा, जब हम इस मानसिकता से मुक्त होंगे।

 

धर्मेंद्र कुमार दूबे, वाराणसी

 

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