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महामना की बगिया

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी एक व्यावसायिक धारावाहिक में सुघड़ नायिका की भूमिका निभाने वाली लोकप्रिय अदाकारा रह चुकी हैं। लेकिन गत दिनों वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में बाहैसियत मानव संसाधन विकास मंत्री आती हैं, तो मानो ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे शहरी कोलाहल से ऊब कर यहां के गेस्टहाउस में आराम […]
Author December 1, 2014 11:45 am

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी एक व्यावसायिक धारावाहिक में सुघड़ नायिका की भूमिका निभाने वाली लोकप्रिय अदाकारा रह चुकी हैं। लेकिन गत दिनों वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में बाहैसियत मानव संसाधन विकास मंत्री आती हैं, तो मानो ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे शहरी कोलाहल से ऊब कर यहां के गेस्टहाउस में आराम फरमाने आई हों। आपसदारी का कहीं कोई संवाद कार्यक्रम नहीं। विद्यार्थियों से कोई मिलना-जुलना नहीं। तीनों लोकों से न्यारी काशी में स्मृति ईरानी का इस तरह आगमन-प्रस्थान किसी छलावे से कम नहीं लगा! बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से विद्यापीठ गए हम लोगों को वहां के आयोजकों ने बैरंग लौटा दिया यह कह कर कि- ‘आपके यहां जाएंगी, तो वहीं मिल लीजिएगा।’ हमारा मिलना तो नहीं हुआ। अगले दिन अखबारों के पृष्ठ पर संघ का ‘कखग’ तक न जानने वाले छात्रों से ‘छात्रसंघ’ के मुद्दे पर उलझती हुई मिलीं।

पिकनिक मनाने का शौक रखने वाले जहां मन में आए वहां जाएं; लेकिन जो सभ्यता, संस्कृति, कला, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, भूगोल-इतिहास, राजनीति-अर्थशास्त्र आदि के वाकई अध्येता-प्रणेता या कि विचारक-संचारक हैं उनका इस ओर आना कई अर्थों में सार्थक है और अनिवार्य भी। मैं पिछले सात वर्षों से बीएचयू में हूं। पंडित मदनमोहन मालवीय की यह बगिया भ्रष्टाचार और तमाम विसंगतियों का शिकार है; लेकिन कहीं कोई चूं तक नहीं। प्लेटो, अरस्तू, मार्क्स, एंगेल्स, वाल्टर बेंजामिन, बिस्मार्क, गांधी, प्रेमचंद, आइंस्टीन, नॉम चोम्स्की, टेरी ईगलटन, ज्यां पाल सार्त्र आदि के जानकार-पुरोधा-वारिस सब चुप!
घोर आश्चर्य! इस मुंहचोर अंधेरे वक्त में मुक्तिबोध के उत्तराधिकारी तक ‘किस फॉर लव’ का जायका ले रहे हैं। कैंपस में दो चीज धुआंधार है; एक अंखलड़ी और दूसरी मुंहलड़ी। एक प्रेम का विषय है और दूसरा राजनीति का। एक में पैसे की धाक है, तो दूसरे में आत्मप्रचार की भूख। यह मगनता क्या भारतीय युवा/ बौद्धिक जमात की वास्तविक अभिव्यक्ति है जिसके लिए बाजार खोजने माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका से लगा कर आस्ट्रेलिया तक की यात्रा कर चुके हैं? भारत का अकादमिक-बौद्धिक परिवेश क्या सचमुच इतना विवेकी और चिंतनपरक हो गया है कि वह यह तय कर सके कि क्या और कौन-सी चीज तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाली है; और कौन-सी दीर्घकालिक?

विशेषतया महामना के गुरुकुल की यह महती जिम्मेदारी बनती है कि वह आत्मावलोकन करे। किसी मंत्री-नौकरशाह की चरण-धुली अपने माथे चढ़ाने की जगह वह अपनी आलोचना-समीक्षा स्वयं करे कि विगत सौ वर्षों में उसने क्या पाया है और कितना बहुमूल्य खो दिया है। पंडित मालवीय के जो नौनिहाल यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं; उनके भीतर यह विश्वविद्यालय क्या सचमुच ऐसा कुछ रोपने-अंकुरित करने को व्यग्र-तत्पर है जिसे अन्यत्र कहीं पर पाना संभव नहीं है? क्या यह विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों को यह ताकीद कर पाने में सफल है कि चारित्रिक-निष्ठा, आत्म-परिष्कार, प्राची-प्रतीची का सुमेल-सहमेल, वैश्विक घनिष्ठता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि मानव-आत्मा के सर्वाधिक प्रेरक विषय हैं?

बीएचयू अपने विद्यार्थियों को क्या यह अहसास करा सकने में सफल है कि बाजारवादी विनिवेश की सत्ता और पूंजीतंत्र को शिकस्त दिए बगैर भारतीय समाज का सांस्कृतिक विकास और उत्थान-उन्नयन महज स्वैर-कल्पना है; निर्मलीकरण का पाखंड है; एक गोरखधंधा है? अगर नहीं तो इस विश्वविद्यालय के अकादमिक-सत्ताधारियों को अपने सच्चे, ईमानदार और प्रतिबद्ध होने संबंधी शपथनामे पर पुनर्विचार करना चाहिए; और मुझ जैसे विद्यार्थी को अंत तक यहां शोध में बने रहने पर!

’राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी

 

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