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दुनिया मेरे आगे: जुगनू मेरी मुट्ठी में

विकास की अंधी दौड़ में हम इतने आगे निकल गए हैं कि हमारे कंधों पर रखी पोटली में से यह खजाना रेत की भांति रिस रहा है।
Author October 6, 2016 05:23 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

बरसात यों तो आकर चली गई, लेकिन पिछले दिनों में शहर पर हल्की बूंदों ने दस्तक दी। तो कल्पना कीजिए कि हल्की-हल्की बारिश हो रही हो, नीम अंधेरा जैसा हो और रात गहराने लगे। झींगुरों की गुन-गुन हो और मेंढकों की टर्र-टर्र शुरू हो जाए। ऐसे मौसम में किसी पार्क में या आपके आसपास अचानक जुगनू चमकने लगें। छोटे-छोटे प्रकाश पुंज कभी इधर तो कभी उधर आकाश में तारों की तरह बिखरने लगें तो कैसा लगेगा! पहले कभी यह हकीकत थी, पर अब कल्पना मात्र लगती है। हो सकता है कि आने वाले समय में लोगों के लिए यह आश्चर्य का विषय हो जाए। किसी संग्रहालय में इस पर उसी तरह शोध करना पड़ सकता है जिस तरह डायनासोर को लेकर शोध होता रहता है। ठीक इसी प्रकार और भी कल्पनाएं हो सकती हैं। जैसे कि जंगल की तरफ से कल-कल बहती आ रही एक नदी। शाम के समय हम नदी के किनारे शांत पानी में धीरे-धीरे उतरती शाम को देख रहे हों। पानी रंग बदल रहा हो कि अचानक कभी नीला, लाल, पीला तो कभी बैंगनी दिखने लगे और ऐसे माहौल में नदी के किनारे बैठे हम शांत पानी में कंकड़ फेंक रहे हों। कंकड़ के पानी में गिरते ही गोलाकार लहरें एक बिंदु से उठें और क्रमश: दीर्घ होती हुई किनारों से जा टकराएं। सोचिए कैसा अनुभव होगा!

दरअसल, पर्यावरण के मसले पर जागरूकता फैलाने के मकसद से कुछ साथियों के हुए एक जमावड़े के दौरान मेरे जेहन में अचानक जुगनू आ गया। गांव के वे दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे। अपने साथियों से मैंने कहा- ‘यारो, तुम लोग भूल गए। आजकल वह छोटा-सा कीड़ा दिखता नहीं है, जिसे ‘लाल गाय’ कहा करते थे। हरी-हरी घास पर मखमली लाल रंग का रेंगता हुआ कीड़ा कितना सुंदर लगता था! अगर हल्के से छू लो तो वह दम साधे स्थिर हो जाता था। गोल-गोल गेंद बन जाता था। और जुगनू की बात तो छोड़ ही दो। अब कहीं दिखते ही नहीं, जिन्हें कभी मुट्ठी बांध कर ले आते थे और माचिस की डिब्बी या कांच की बोतल में बंद कर देखा करते थे। कितने क्रूर थे हम लोग! ल्ेकिन आज वही सब याद आ रहा है। हरियाली से आच्छादित छोटा सुंदर-सा गांव और गांव की सीमा रेखा पर कल-कल बहती नदी। छुट्टी के दिनों में उसमें घंटों नहाना। सुबह उठते ही गांव के छोर पर सिद्ध महाराज की मढ़िया तक सैर कर आना और नदी से सुंदर-सुंदर सीपी और श्ांख बटोरना…।

यह सब हमने देखा है। लेकिन आने वाले समय में जिनसे हम यह सब कहेंगे उनके लिए यह सब सिर्फ कल्पना का विषय हो जाने वाला है। विकास की अंधी दौड़ में हम इतने आगे निकल गए हैं कि हमारे कंधों पर रखी पोटली में से यह खजाना रेत की भांति रिस रहा है। सब कुछ खोते जा रहे हैं। पलट कर देखने की फुर्सत नहीं है हमारे पास। आगे समय बताएगा कि हमने सब जानते हुए कितना कुछ खो दिया है। हालांकि अब नदी नाला है और पहाड़ नंगे हो चुके! इन्हें वापस लाना मुश्किल काम है। मोटरगाड़ियों की संख्या के हिसाब से सड़कें चौड़ी हो रही हैं। दो लेन से चार और छह की होती जा रही हैं। उसी अनुपात में पेड़-पौधे और हरियाली घटती जा रही है। यह चिंता का विषय है। फिर भी बारिश में एक अदद जुगनू का दिखना घुप्प अंधेरे में प्रकाश की एक किरण की तरह सुख दे गया मुझे। उस वक्त मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं आश्चर्यचकित था कि ट्रेन में सफर के दौरान मेरे सिरहाने रखी अटैची पर बैठा एक जुगनू चमक रहा था। मानो कह रहा हो कि ‘अभी तो हूं।’

आज से तीस वर्ष पहले जब मैंने कॉलेज में कदम रखा था। प्रतिदिन साथियों के साथ टेÑन से जाना-आना करता था। उस समय रास्ते में हरे-भरे सघन वन हुआ करते थे। जहां से यात्रा शुरू करते थे, वहां से चंद मिनटों की दूरी पर जंगल शुरू हो जाता था। रेलवे लाइन से लग कर अनगिनत साल वृक्ष लगे थे। गरमी में लाल-लाल दहकते टेसू देख कर ऐसा लगता था, मानो पूरा जंगल धधक रहा है। इसी दौरान एक बार एक विदेशी दंपति से मेरी मुलाकात हुई थी। वे मुंह फाड़े उस अप्रतिम दृश्य को देख रहे थे। बातचीत के दौरान उनमें से एक ने कहा था- ‘इस खजाने को संभाल कर रखिएगा। इसे देखने हम लोग इतनी दूर से चले आते हैं।’ यह बात आज तक नहीं भूला हूं। जब कभी भूली-बिसरी यादें ताजा करने कॉलेज की तरफ निकलता हूं तो इक्का-दुक्का टेसू का पेड़ ही नजर आता है। पूरा जंगल साफ हो गया है। उसकी जगह कंक्रीट का जंगल फैल रहा है।

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  1. R
    raj kumar
    Oct 6, 2016 at 4:02 am
    कुछ साल पहले में बेंगलोर गया था ट्रैन से पुरे रास्ते जंगल पेड़ पौधे और हरयाली देखकर मन खुश हो जाता पर जब शहर में ट्रैन घुसती तो ट्रैक के आसपास और कूड़े के ढेर आते ही पता लग जा रहा था की सेहर आ गया पुरे रास्ते में बहुत ही न के बराबर सिटी मिले जहाँ एंट्री करते ख़ुशी महसूस हो दक्षिणी भारत की अपेछा उत्तरी भारत में ज्यादा हे न ही लोग जागरूप हैं . पता नहीं कब लोग सचेत होंगे. दिल्ली २५ साल पहले घूमने में अच्छी लगती थी पर अब हरयाली कही कही देखने को मिलती हे
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    सबरंग