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चौपालः कचरा प्रबंधन

‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ सुनने में बहुत अच्छा लगता है। हम अपने स्वप्न में ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहां की सड़कों पर जगह-जगह कूड़ा कचरा न फैला हो।
Author September 8, 2017 02:51 am
पंद्रह मंजिला कूढ़े के ढेर में अचानक विस्फोट हुआ और वह भरभरा कर नीचे आ गया।

‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ सुनने में बहुत अच्छा लगता है। हम अपने स्वप्न में ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहां की सड़कों पर जगह-जगह कूड़ा कचरा न फैला हो। आज हमारे देश की आधी से ज्यादा नदियां और नहरें पानी की जगह कचरे से लबालब हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। आजादी के बाद यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री ने देशवासियों को साफ-सफाई के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया हो। यह निश्चित ही सराहनीय कदम है जिसके तहत सबसे पहले नागरिकों को खुले में शौच न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मगर सवाल है कि आखिर सरकार कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दे पर क्यों लगातार विफल नजर आ रही है? देश का शायद ही कोई शहर हो जहां की सड़कों से शत-प्रतिशत कूड़ा उठाकर उसे पुनर्चक्रित (रिसाइकिल) किया जाता हो। जो कूड़ा सड़कों से उठाया जाता है, उसे या तो डलावघरों पर पटक दिया जाता है या फिर खुले में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। कूड़े से निकलने वाली रासायनिक गैसों से एक तरफ बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है।

पिछले दिनों दिल्ली के गाजीपुर में कचरे का पहाड़ गिरने से तीन लोगों की मौत हो गई। वहां पंद्रह मंजिला कूढ़े के ढेर में अचानक विस्फोट हुआ और वह भरभरा कर नीचे आ गया। हादसा इतना भयानक था कि आसपास खड़े कई वाहन भी नहर में गिर गए। सवाल है कि जब इन डंपिंग साइट्स की क्षमता खत्म हो चुकी है तो उसके बाद भी कचरा प्रबंधन की कोई व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही? अगर सिर्फ राजधनी दिल्ली के आंकड़ों की बात करें तो रोजाना 10 हजार टन कूड़ा इकट्ठा होता है जिसे डम्पिंग साइट्स पर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। रिसाइक्लिंग की कोई व्यवस्था न होने के कारण ही डम्पिंग साइट्स पर कूड़े के पहाड़ बन रहे हैं, जिससे आम जन बीमारियों के चक्रव्यूह में फंसते चले जा रहे हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, 2014-15 में 514 लाख टन ठोस कूड़ा निकला था जिसमें से महज 27 प्रतिशत कूड़े का समाधान हो पाया। बाकी बचा-खुचा कूड़ा नदियों, नालों और तालाबों के जरिए समुद्र में पहुंच गया। इस हिसाब से हर साल करीब छह अरब टन कचरा समुद्र में प्रवाहित हो रहा है।

पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल तकरीबन 620 लाख टन कचरा पैदा होता है जिसमें से 430 लाख टन कूड़े को ही एकत्रित किया जाता है। शेष 190 लाख टन कूड़ा या तो डंपिंग साइट्स में जमा रहता है या फिर सड़कों, नालियों, नहरों और नदियों की शोभा बढ़ाता है। इकट्ठा किए गए 430 लाख टन कूड़े में से 30 प्रतिशत यानी महज 129 लाख टन कूड़ा ही रिसाइकिल हो पाता है।
कचरा प्रबंधन एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान जल्द से जल्द किया जाना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों ने कूड़ा प्रबंधन को लेकर तमाम योजनाएं बनाई हुई है। समस्या है कि इन योजनाओं का संचालन निजी हाथों में न होकर नगर निगम जैसी संस्थाओं के हाथ में हैं। इन संस्थाओं में मानव शक्ति की कमी होने के कारण कूड़े का निस्तारण सही समय पर नहीं हो पाता है। जो कूड़ा निस्तारित भी किया जाता है वह रिसाइकिल न होने के कारण डंपिंग साइट्स पर सड़ता रहता है। सरकार को चाहिए कि ऐसी योजनाओं को निजी हाथों में सौंप कर कचरे को रिसाइकिल कराने की ओर ध्यान दे। इससे एक तरफ ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ का सपना साकार होगा वहीं दूसरी तरफ बेरोजगार युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।
’कर्तव्य खन्ना, गुजैनी, कानपुर

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