December 06, 2016

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प्रदूषण की मार

अरविंद केजरीवाल पड़ोसी राज्यों में खेतों में जलाए गए फसलों के अवशेष को समस्या की मुख्य वजह बताते रहे है।

Author November 9, 2016 06:05 am
दिल्ली एनसीआर में धुंध से बचने के लिए मास्क की मांग अचानक तेजी बढ़ गई।

दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर खतरे की हद पार कर चुका है, इसे मापने वाले उपकरण फेल हो गए, स्कूलों में छुट्टी करनी पड़ी, दिल्लीवासियों को बिना जरूरी काम के घर से बाहर नहीं निकलने की सलाह दी गई। अब दिल्ली को सहज रूप से जीने लायक बनने में कितने दिन लगेंगे, पता नहीं! दिल्ली सरकार ने कुछ दिनों के लिए पॉवर प्लांट बंद करने, निर्माण कार्य प्रतिबंधित करने जैसे कदम उठाए और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने चार पड़ोसी राज्यों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक बुलाई। उधर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने सरकारों को फटकार लगाई। लेकिन इन उपायों से कितना फर्क आएगा, कहना मुश्किल है। केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच एक राय कभी नहीं होती। इस बार भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पड़ोसी राज्यों में खेतों में जलाए गए फसलों के अवशेष को समस्या की मुख्य वजह बताते रहे, जबकि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का दावा है कि मुख्य प्रदूषण स्रोत दिल्ली के अंदर ही हैं और फसलों के अवशेष केवल बीस प्रतिशत प्रदूषण फैला रहे हैं। कम से कम ऐसी गंभीर समस्याओं से तो मिल कर लड़ना चाहिए!

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हरित पंचाय ने फटकार लगाई, लेकिन सरकारें शायद किसी ढीठ बच्चे जैसी आलोचना, फटकार पचाने की आदी हो चुकी हैं। सोए हुए को गहरी नींद से जगाना आसान है, लेकिन हमारी सरकारों को जगाना असंभव काम लगता है। क्या दिल्ली के वायु प्रदूषण की समस्या आज की है? न जाने कितने सालों से दिल्ली के एयर-कंडीशंड कमरों में पर्यावरण सहित देश के गंभीर मुद्दों-समस्याओं पर बैठकें, सेमिनार होते रहे हैं और इनके बहाने कुछ लोग बढ़िया खाने, घूमने-फिरने का सुख भोगते आए हैं। पर्यावरण मंत्रालय पिछले डेढ़ दशक से नेशनल ग्रीन कोर और तीन दशकों राष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता अभियान इन्ही मुद्दों पर जोर दे रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय हर साल बड़ा बजट इन पर खर्च करता है। लेकिन असल में इतने रुपए, बच्चों का समय और श्रम खर्च करके इतने सालों के बाद भी स्थिति बेहतर हुई या बदतर- यह जानने की किसी को चिंता या फुर्सत नहीं है!

देश में शिक्षा बढ़ रही है। दिल्ली में पढ़े-लिखे ‘समझदार’ लोगों की संख्या ज्यादा ही होगी। पर्यावरण प्रदूषण की वजहें बच्चे भी गिना देंगे। लेकिन इससे क्या होता है! दिवाली में पटाखे जलाना हमारा ‘मौलिक अधिकार’ है? सरकार प्रतिबंध लगा सकती थी, अगर उसे वोट-बैंक से अधिक जन-स्वास्थ्य और जनहित की फिक्र होती। लोग अगर पटाखे नहीं छोड़ेंगे तो सामाजिक रुतबे का पता कैसे चलेगा! इसलिए कौन कितना बड़ा हैसियत वाला है, इसका पता उसके घर की आतिशबाजी और जोरदार धमाकों से ही चलता है!
’कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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First Published on November 9, 2016 6:05 am

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