ताज़ा खबर
 

खुदकुशी की खेती

विकास के तमाम दावों और पूंजी के प्रति समर्पण के लिए किसानों और मजदूरों के अधिकारों की बलि चढ़ाने की कसरतों के बीच किसानों की आत्महत्याओंका दौर जारी है। हमारे कृषिमंत्री इसके कारणों में जाने या उनके समाधान तलाशने की बजाय किसानों की आत्महत्याओं को ही नकार रहे हैं और इनके लिए प्रेम-प्रसंग में विफलता […]
Author नई दिल्ली | September 4, 2015 08:42 am

विकास के तमाम दावों और पूंजी के प्रति समर्पण के लिए किसानों और मजदूरों के अधिकारों की बलि चढ़ाने की कसरतों के बीच किसानों की आत्महत्याओंका दौर जारी है। हमारे कृषिमंत्री इसके कारणों में जाने या उनके समाधान तलाशने की बजाय किसानों की आत्महत्याओं को ही नकार रहे हैं और इनके लिए प्रेम-प्रसंग में विफलता या नपुंसकता को जिम्मेवार बता रहे हैं। ऋण का भार, कभी अतिवृष्टि, कभी अकाल, फसल तैयार होने पर सट्टाबाजारी मूल्य की मार, लागत-आधारित समर्थन मूल्य का अभाव किसान पर निरंतर कर्जभार बढ़ते जाने का सबब बनते हंै। कृषि लागत को लेकर स्वामीनाथन आयोग की ओर से सुझाई सिफारिशें आज तक सरकार के पास धूल फांक रही हैं।

हमारे देश में आज भी करीब पचास करोड़ लोग सीधे-सीधे खेती से जुड़े हैं। 26.3 करोड़ लोग खेत मजदूर हैं। औद्योगिक सुस्ती, सेवा क्षेत्र के बढ़े दायरे के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था कृषि के सहारे है और रोजगार का सबसे बड़ा हिस्सा आज भी इस पर आश्रित है। लेकिन कृषि संकट, जो विशेषकर लागत की तुलना में फसल के दाम कमतर मिलने से जुड़ा हुआ है, के हल की कोई सरकारी कोशिश सामने नहीं आई है। सरकारों का जोर ले-देकर बैंकों के सहारे कृषि ऋण तक सिमटा है, वह भी बड़े किसानों तक। सीमांत किसान का कोई खैरख्वाह नहीं है। फसल ऋण की राशि को भी देखें तो यह बहुत कम है। राजस्थान में किसान को जमीन गिरवी रखकर प्रति बीघा खेती जमीन पर महज दस हजार रुपए की ऋण राशि दी जाती है।

नब्बे का दशक सामाजिक और विकास बैंकिग को पीछे धकेलने के तौर पर याद किया जाएगा। यहां कृषि ऋण में भारी गिरावट और मोड़ देखने में आए हैं। छोटे और सीमांत किसानों को महाजनों के हवाले छोड़ दिया गया। 2004 से सीमित संख्या में हुई कृषि साख पुनर्चलन की स्थिति लाभार्थियों के बीच बढ़ी असमानता को सामने ले आई है।

पिछले दस वर्षों में लगभग एक-चौथाई बढ़ी कृषि साख के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी और निगमित व्यवसायियों के कृषि उत्पादों से जुड़े वाणिज्यिक और निर्यात आधारित उत्प्रेरक रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में बड़े किसानों को मिले व्यक्तिगत ऋणों में भारी इजाफा हुआ है। 1990 से 2011 के बीच जहां बीस हजार रुपए तक के कृषि ऋण का हिस्सा 92 से 48 प्रतिशत तक गिरा है, वहीं इसी अवधि में दस लाख से अधिक कृषि ऋण लेने वालों का हिस्सा चार से तेईस प्रतिशत के लगभग आ गया है। ये बड़े ऋण कृषि आधारित नए उद्यमों की गतिविधियों के निहितार्थ दिए गए हैं। 2011 में कुल कृषि साख के स्रोतों का हिसाब लगाएं तो देखेंगे कि कुल कृषि साख का लगभग तैंतीस प्रतिशत हिस्सा और प्रत्यक्ष कृषि साख का लगभग छब्बीस प्रतिशत हिस्सा नगरों और महानगरों के बैंकों से आया है जो बड़े किसानों से जुड़ा हुआ है।

रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग