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खामोश शहादत

देश की राजधानी के बीचोंबीच दिल दहला देने वाली घटना हुई है। जो हुआ वह आजकल प्रमुखता से हो रहे अपराधों से खासा अलग था।
Author May 31, 2017 05:24 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

खामोश शहादत

देश की राजधानी के बीचोंबीच दिल दहला देने वाली घटना हुई है। जो हुआ वह आजकल प्रमुखता से हो रहे अपराधों से खासा अलग था। न गोरक्षा के नाम पर वितंडा खड़ा हुआ और न ही बीमार मानसिकता के किसी व्यक्ति ने किसी स्त्री की आबरू पर हमला किया। बात केवल इतनी-सी थी कि वह एक ई-रिक्शा चालक था और उसने सभ्य कही जाने वाली राजधानी दिल्ली के दो लड़कों को सड़क पर पेशाब करने से मना किया था। एक कम पढ़े-लिखे मजदूर तबके के साधारण-से आदमी की कही समझदारी की छोटी-सी बात उन दो तथाकथित पढ़े-लिखों को इतनी चुभ गई कि अपनी समझ और आपा खो बैठे तथा कुछ ही घंटों बाद वहीं बीस-पच्चीस की अपराधी-भीड़ जुटा लाए। फिर उसी भीड़ ने वहीं बीच सड़क पर स्वच्छ भारत के नारे को गंदा होने से बचाने का जुर्म करने वाले रिक्शा चालक को पीट-पीटकर सजा-ए-मौत दे डाली।

नफरत भरी वह भीड़ न जातीय और न ही किसी धार्मिक उन्माद के कारण वहां इकट्ठी हुई थी। क्या यह घटना शहरी मध्यवर्ग की कथित निम्न वर्ग के प्रति असहिष्णुता का एक नमूना नहीं है? इस घटना के खिलाफ जो उबाल सोशल मीडिया और सड़क पर आना चाहिए था वह क्यों नहीं आया? क्या हमने इस घटना को सिवाय अफसोस के चंद लफ्जों के किसी और प्रतिक्रिया लायक इसलिए नहीं समझा कि मारने वालों और मरने वाले की जाति और धर्म हम नहीं जानते थे? क्या हम भीतर से इतने राजनीतिक और धार्मिक हो चुके हैं कि तभी जुबान खोलना पसंद करते हैं जब मामले से संबंधित ‘एंगल’ जुड़ा हो। मारने वाली भीड़ अगर किसी दल विशेष या धर्म विशेष के नेता के नेतृत्व में गई होती तो इस घटना पर हमारा क्या रुख होता? जिसे मारा गया उसका गुनाह किसी को सार्वजनिक स्थान को गंदा करने से रोकने के अलावा अगर गोकशी होता या गोकशी को रोकने वाला होता तब भी क्या हम इतने ही चुप बैठते?

और अंत में एक और सवाल, सीमा पर देश की सुरक्षा में, घोषित शत्रुओं के अपेक्षित हमलों में मारे जाने वाले लोग अगर जवान हैं, उनकी मौत शहादत है, तो देश की राजधानी में तमाम कानून व्यवस्था की नाक के नीचे, सरकार के एक खास अभियान को कुछ लोगों द्वारा बर्बाद करने से बचाते हुए अपने ही देश के नागरिकों द्वारा मार दिया जाने वाला शख्श कौन है? उसका सरकारी दर्जा क्या होगा?यह घटना मन को झकझोर देती है और घटनाओं के बारे में अपनी प्रतिक्रिया की प्राथमिकताओं पर सोचने को विवश भी करती है। इस घटना पर सोचिए और अपने भीतर झांकिए। अगर कोई हलचल नहीं होती तो एक मानव के रूप में निश्चय ही हम रोगी हो चुके हैं।
’अंकित दूबे, जनेवि, नई दिल्ली
कैसी नीति
जीएसटी लागू होने के बाद कई चीजें महंगी और कई चीजें सस्ती हो जाएंगी। वित्तमंत्री ने कहा कि शिक्षा पर कोई कर नहीं लगेगा पर स्टेशनरी, स्कूल बैग, पेन, कलर बुक्स आदि पर 12 से 28 फीसद तक टैक्स लगेगा। क्या ये चीजें शिक्षा के अंतर्गत नहीं आतीं? एक तरफ सरकार शिक्षा के प्रति खुद को काफी गंभीर बताती है लेकिन दूसरी तरफ शिक्षा से संबंधित सामग्री पर 28 फीसद तक टैक्स भी लगाती है! यह कैसी नीति है? सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए!
’जफर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा, बिहार

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