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इतिहास से आगे

देश में बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद का कारण दरअसल एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। खासकर अनौपचारिक और सामाजिक रूप से जो इतिहास हमने जाना और पढ़ा है, वह सांप्रदायिकता का एक मुख्य कारक है।
Author November 25, 2015 23:34 pm

देश में बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद का कारण दरअसल एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है। खासकर अनौपचारिक और सामाजिक रूप से जो इतिहास हमने जाना और पढ़ा है, वह सांप्रदायिकता का एक मुख्य कारक है। इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्याएं खूब होती हैं और इसीलिए खतरनाक है, क्योंकि बचपन से किस्से-कहानियों और मोहल्ला-परिवार स्तर तक मौखिक ज्ञान के तौर पर गलत जानकारियां हमारे भीतर भर गई हैं।
हममें से ज्यादातर यही जानते हैं कि भारतीय इति

स का प्राचीन काल गौरव और महानता का युग था और मध्यकाल से भारत का पतन शुरू हुआ। ब्रिटिश उपनिवेशवादी लेखकों और उनका अनुसरण कर रहे सांप्रदायिक लेखकों ने वर्तमान में इतिहास के नफरत का दौर शुरू किया, जिससे मुसलिम लीग और विनायक सावरकर जैसों को दो राष्ट्र सिद्धांत के रचना की प्रेरणा मिली। आज हालात ऐसे हैं कि टीपू सुल्तान जैसे वीर योद्धाओं के राष्ट्रीय योगदान पर सवालिया निशान लगते हैं और हिंसा भड़क जाती है।

सांप्रदायिकों ने प्रचार किया कि भारत का मतलब हिंदू राष्ट्र है और मध्यकालीन मुसलिम शासन विदेशियों का था। उनके द्वारा हिंदू बहुत सताए गए, बुरा व्यवहार किया गया। यह विचार भी ब्रिटिश शासकों के बुद्धिजीवियों ने पैदा की जिसे भारतीय सांप्रदायिकों ने सुविधानुसार आगे बढ़ाया।

आज डर पैदा करने की कोशिश की जाती है कि जो मुसलिम शासकों ने मध्यकाल में किया, वह आज के मुसलमान फिर कर सकते हैं! इसलिए उनसे सावधान रहना चाहिए। यह बहुसंख्यक होने के बावजूद लोगों के भीतर भय का मनोविज्ञान बनाने की कोशिश है। दूसरी ओर, कुछ मुसलिम समुदाय के लोग भी अपने अल्पसंख्यक होने की स्थिति को भुनाते हैं। मौजूदा समय में बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक के बराबर या अल्पसंख्यक होने का खौफ है तो अल्पसंख्यकों को अपनी रक्षा के उपाय बढ़ाना जरूरी लगता है। इस क्रम में राजनीतिक-आर्थिक या सामाजिक जिम्मेदारियां गौण हैं।

1959-61 के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई सांप्रदायिक और भाषाई हिंसा पर विचार करते हुए राष्ट्रीय एकता परिषद ने 1961 में निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान स्कूली इतिहास के पाठ्य-पुस्तकों में मौजूद सांप्रदायिक और अन्य पूर्वाग्रह और इन पुस्तकों की घटिया सामग्री दंगों की जमीन बनाती है। इन पूर्वाग्रहों के पलने-बढ़ने का जिम्मेदार भारतीय इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या और मौखिक विचरण में इतिहास का बदलता स्वरूप ही है।
’रोहिण कुमार, दिल्ली विवि

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