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चौपालः गोरक्षा की आड़

गोरक्षकों का गोरखधंधा बेलगाम जारी है। रोज एक नया शिकार उनकी सूची में आ जाता है। नागपुर में हालिया शिकार सलीम तो भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे का अध्यक्ष था।
Author July 15, 2017 02:30 am
पीएम मोदी की चेतावनी के बाद भी असम के सोनपुर में लोगों ने गाय ले जा रहे एक शख्स की पिटाई कर दी (Photo-ANI)

गोरक्षकों का गोरखधंधा बेलगाम जारी है। रोज एक नया शिकार उनकी सूची में आ जाता है। नागपुर में हालिया शिकार सलीम तो भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे का अध्यक्ष था। आस्था की सनक पर सवार भीड़ न कोई तर्क सुनती है और न कोई रहम करती है। अब तक अलग-अलग जगहों पर गोरक्षा के नाम पर अट्ठाईस लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। नागपुर में पिटा सलीम तो भाजपाई होने का दावा करता रहा, फिर भी गुंडई पर उतारू गोरक्षकों ने कोई रहम नहीं किया। नरेंद्र मोदी ने साबरमती जाकर गोरक्षकों को हिंसा से बाज आने के लिए कहा लेकिन ठीक उसी समय झारखंड में और उसके बाद असम में और अन्य जगहों पर भीड़ की हिंसा का वैसा ही तांडव जारी रहा है।

प्रचार की भूख जितनी है, उसका शतांश भी अमल नहीं। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गैंगरेप पीड़िता को देखने जाने का प्रचार तो खूब हुआ पर उसके जीवन की चिंता किसे है? उसी पीड़िता पर उसके बाद चार बार तेजाबी हमले हो गए। अपराधी बेखौफ हैं। रायबरेली में पांच जनों को जिंदा जला दिया गया। रेप दर रेप, लूट दर लूट, बर्बरता और भीड़ की हिंसा कानून के राज की धज्जियां उड़ा रहे हैं। कश्मीर के पत्थरबाजों को सरकार और उसके पिछलग्गू मीडिया ने इतना प्रचारित कर दिया कि अब तो हर कहीं जरा-सी बात पर पत्थरबाजी की घटना सामने आ जाती है। राजस्थान में ही अदालती गवाही से लौटते समय पौने दो साल पहले लापता हुए अपराधी आनंदपाल के हालिया एनकांउटर के बाद भी भारी उपद्रव हुआ। रोडवेज की छह बसें जला दी गर्इं। रेल पटरियां उखाड़ दी गर्इं। एसपी पर हमला कर दिया। उसके गार्ड की एके 47 छीन ले गए। जिस करणी सेना की फिल्म का सैट जलाने, जयपुर में शूटिंग न करने देने और पद्मावती संग्रहालय के शीशे तोड़ने जैसी कारस्तानियों पर सरकार तमाशबीन बनी हुई थी, उसे भला सांवरदा में कैसे रोकती? गोरक्षक बहरोड़ में उत्पात मचाएं या जैसलमेर या जयपुर में, सरकार मौन रहती है। किसी की जान जाए, किसी की आजीविका छिन जाए तो उसकी बला से! दोहरे मानदंड वाले ये कथित शुचितावादी कौन-सी संस्कृति को प्रोन्नत कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री कहें कि भीड़ की यह हिंसा स्वीकार्य नहीं और राष्ट्रपति ठोस कार्रवाई की बात करें लेकिन फिर भी कुछ होता नहीं दिखे तो क्या कहा जाए?अमित शाह के मुताबिक यूपीए सरकार के समय ज्यादा घटनाएं होती थीं पर तब किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया। गलतबयानी,समस्या का समाधान न करना, अपनी हर गलती को ढकने के लिए पिछली सरकार पर दोष मढ़ना इनकी फितरत-सी बन गई है जबकि हकीकत यह है कि 97 प्रतिशत घटनाएं इन्हीं के शासनकाल में हुई हैं।

एक कविता इस नफरती परिवेश को सही शब्द देती हुई सोशल मीडिया में प्रसारित हो रही है। इसमें कहा गया है कि ‘हत्यारों के गिरोह का एक सदस्य हत्या करता है, दूसरा उसे दुर्भाग्यपूर्ण बताता है, तीसरा मारे गए व्यक्ति के दोष गिनाता है, चौथा हत्या का औचित्य ठहराता है, पांचवां समर्थन में सिर हिलाता है और अंत में सब मिल कर बैठक करते हैं, अगली हत्या की योजना के संबंध में।’ यह भीड़ की हिंसा वैज्ञानिक शोध और अद्यतन तकनीकी प्रयोग के युग में उन भूतपक्षी अंध धारणाओं की याद दिलाती है जिन्होंने ‘सूर्य पृथ्वी के चारों ओर नहीं, बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है’ का तथ्यात्मक उद्घाटन करने वाले वैज्ञानिक गैलीलियो को ईसाई धर्मांधों ने भीड़ को उकसा कर मरवा दिया था। गैलीलियों को मारने वाली भीड़ तो कब की मर गई अमरता को प्राप्त गैलीलियो का नाम और उनका सिद्धांत युग युगांतर बना रहेगा।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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