December 07, 2016

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भारतीय बाजारों से चीनी-उत्पादों के बहिष्कार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इस बहिष्कार ने चीन को बुरी तरह बौखला कर रख दिया है।

Author October 22, 2016 03:11 am

भारतीय बाजारों से चीनी-उत्पादों के बहिष्कार ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इस बहिष्कार ने चीन को बुरी तरह बौखला कर रख दिया है। तिस पर ब्रिक्स-बिम्सटेक सम्मेलन में पाकिस्तान को लेकर चीन पर हुए परोक्ष भारतीय कूटनीतिक हमले ने उसकी तिलमिलाहट को और अधिक गहरा दिया है। अमूमन शांत बने रहने वाले चीन की यह अपूर्व बौखलाहट बता रही है कि भारतीय कूटनीति का अचूक तीर एकदम निशाने पर जाकर लगा है। गौरतलब है कि चीन की यह तीखी प्रतिक्रिया वहां के सरकार द्वारा नियंत्रित अखबार ‘ग्लोबल-टाइम्स’ के हवाले से आई है, जिसे चीन सरकार की अधिकृत आवाज के रूप में ही देखा-समझा जाना चाहिए। चीन झुंझलाहट में अपनी कूटनीति को ताक पर रख कर भाषाई संतुलन तक खो रहा है। अखबार का कहना है कि भारत केवल ‘भौंक’ सकता है, वह दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के लिए कुछ कर नहीं सकता। यहां तक कि उसने भारत के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को अव्यावहारिक बताते हुए चीनी कंपनियों को भारत में निवेश करने को लेकर परोक्ष रूप से धमकाया भी है।

दरअसल, यह बात सच है कि भारत का द्विपक्षीय व्यापार चीन की तुलना में पचास अरब डॉलर कम है। भारत में चीन से जहां इकसठ अरब डॉलर का आयात होता है, वहीं भारत उसे केवल नौ अरब डॉलर का निर्यात कर पाता है। दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात के इस विशाल असंतुलन के बावजूद यह बात तय है कि द्विपक्षीय व्यापार दो देशों की परस्पर सहमति से ही चल सकता है। इस परस्पर सहमति में भी उस देश का ग्राहक ही सबसे अहम और निर्णायक कारक होता है। यह बात चीन भी अच्छे से समझता है मगर फिर भी अपने व्यापारिक-हितों को ताक पर रख कर वह यदि पाकिस्तान को लेकर दोहरे रवैये वाला खेल खेलता रहेगा, तो उसे अपने हिस्से के व्यापारिक-लाभ की हानि अपने बहिष्कार के रूप में उठानी ही पड़ेगी।

चीन पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर को लेकर संयुक्त राष्ट्र में पहले ही वीटो कर भारत के साथ छल कर चुका है। एक तरफ तो वह भारत के साथ मिलकर वैश्विक आतंकवाद को पराजित करने का संकल्प दोहराता है, और दूसरी तरफ पाकिस्तान को खुली सैन्य और आर्थिक मदद देकर अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका भी निभाता है। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोकना, पाक अधिकृत कश्मीर में भारत के विरोध के बावजूद ‘चीन-पाक इकॉनोमिक कॉरिडोर’ का निर्माण करना, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और एनएसजी में भारत की दावेदारी में रोड़ा अड़ाना, ये ऐसी वजहें हैं जिन्होंने भारतीयों के गुस्से को चीनी-उत्पाद के बहिष्कार के रूप में मुखर होकर अभिव्यक्त किया है।

गौरतलब यह भी है कि चीन इतना ‘चुप-छली’ है कि वह कभी भी इतनी जल्दी और हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है। मगर आज चीनी-उत्पादों के बहिष्कार से उपजी आर्थिक-क्षति ने उसे संयम खोने पर मजबूर कर दिया है तो उसकी दो प्रमुख वजहें हैं। पहली यह कि ब्रिक्स सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति की उपस्थिति में पाकिस्तान को जोरदार लताड़ लगाई थी। उसमें कहीं न कहीं चीन की भूमिका भी सामने आई है, जिसे विश्व-बिरादरी ने नोटिस भी किया है। दूसरा, आतंकवाद के मुद्दे पर आज जब समूची विश्व-बिरादरी एक मंच पर साथ-साथ नजर आ रही है तब पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करने की वजह से चीन की कलई दुनिया के सामने खुलती नजर आ रही है। साफ है कि इसकी अहम वजह भारत ही है जिसके अथक प्रयासों से आतंकवाद के विरुद्ध आज वैश्विक-मंच पर अभूतपूर्व माहौल बन सका है। इस परिदृश्य में पाक और चीन की जुगलबंदी खलनायक बन कर उभरती प्रतीत हो रही है। ये बातें चीन को नागवार गुजर रही हैं। और यही उसकी बौखलाहट की मुख्य वजह भी है।
’राजेश सेन, इंदौर

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First Published on October 22, 2016 3:10 am

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