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चौपाल: कौन खोलेगा पोल, सेहत का सवाल

आज देश में 93 फीसद अस्पताल निजी क्षेत्र के हैं, जो मोटी रकम वसूल करते हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा स्टाफ की भारी किल्लत है।
Author March 8, 2017 05:03 am
शहरी क्षेत्रों में उदारीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवा में काफी सुधार आया है लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में तीव्र निजीकरण से स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।

कौन खोलेगा पोल

कुछ समय पूर्व सीमा सुरक्षा बल के कांस्टेबल तेज बहादुर यादव ने सोशल मीडिया पर वीडियो के जरिए सैनिकों के दिए जा रहे घटिया खाने की पोल खोली थी। वह वीडियो जितनी तेजी से वायरल हुआ, सीमा सुरक्षा बल और रक्षा मंत्रालय में उतनी ही तेजी से सनसनी फैल गई। भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले को सम्मान और सुरक्षा देने के बजाय उलटा उसी पर अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए। खाने की गुणवत्ता की दिखावटी जांच के साथ सैनिक के पुराने रिकॉर्ड निकाल कर किसी भी प्रकार से उसे गैरजिम्मेदार साबित करने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई। बीएसएफ के आला अधिकारियों ने नसीहत या यूं कहें धमकी दी कि किसी भी प्रकार की समस्या अपने उच्च अधिकारी को बताई जाए। यह तो वैसी ही बात हो गई जैसे चोर से ही जाकर चोरी की शिकायत करना। अब भला कोई अपनेखिलाफ आरोप क्यों सुनेगा?

एक तरफ सरकार चौबीस घंटे सोशल मीडिया पर कंपनी उपलब्धियां गिनाने से नहीं थकती, बार-बार जनता से प्रतिक्रिया देने को कहा जाता है वहीं दूसरी ओर रक्षामंत्री कहते हैं कि सैनिक अपनी शिकायतें सोशल मीडिया पर न डालें क्योंकि विभागीय शिकायतों को तो दबाया जा सकता है मगर सोशल मीडिया पर सारी जनता को पता चल जाएगा कि सरकार भ्रष्टाचार को लेकर कितनी गंभीर है। खेद का विषय है कि जिन सैनिकों की दुहाई देकर सरकार आम जनता को नोटबंदी से होने वाली सभी समस्याएं झेलने की नसीहत देती है उन्हीं सैनिकों के राशन में होने वाले घपलों को हलके में लिया जा रहा है। यदि भ्रष्टाचार की पोल खोलने वालों को हतोत्साहित और प्रताड़ित करने का सरकार का यही रवैया रहा तो कोई भी व्यक्ति अपनी जान खतरे में डाल कर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगा। इस प्रकार तेज बहादुर जैसे देशभक्तों ने जो आशा की एक छोटी-सी लौ जलाई है वह भी बुझा दी जाएगी और हमारे बाबुओं और माननीयों को लूट की खुली छूट मिल जाएगी!
अनिल हासानी, ओम नगर, हलालपुरा, भोपाल

 

सेहत का सवाल

आज भारत के सामने स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत-सी चुनौतियां हैं। यहां शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार पर 57 है लेकिन इसमें भी काफी क्षेत्रीय और वर्गीय विषमता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार मातृत्व मृत्यु दर प्रति लाख पर 167 है। आदिवासी क्षेत्रों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है जबकि केरल में मातृत्व मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। आज भी भारत में 40 फीसद बच्चे कुपोषित हैं और 53 फीसद महिलाएं खून की कमी से जूझ रही हैं। दूसरी तरफ भारत अनेक संक्रामक व गैर-संक्रामक बीमारियों की वैश्विक राजधानी बनता जा रहा है।

शहरी क्षेत्रों में उदारीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवा में काफी सुधार आया है लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में तीव्र निजीकरण से स्वास्थ्य सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। आज देश में 93 फीसद अस्पताल निजी क्षेत्र के हैं, जो मोटी रकम वसूल करते हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा स्टाफ की भारी किल्लत है। कई गांवों में पंद्रह-पंद्रह किलोमीटर की दूरी तक एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तक नहीं है। आज भी लगभग 70 फीसद डाक्टरों के, 52 फीसद नर्सों के पद खाली पड़े हैं। सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त बिस्तर न होने के कारण कई बार मरीजों को फर्श पर लेटा दिया जाता है। इन समस्याओं और चुनौतियों से निपटने के लिए बहुआयामी और बहुस्तरीय प्रयास की जरूरत है।

कैलाश बिश्नोई, मुखर्जी नगर, दिल्ली

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