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स्विट्जरलैंड में हाल में हर नागरिक के बैंक खाते में 2500 स्विस फ्रैंक सालाना जमा कराने के एक प्रस्ताव पर सरकार ने जनमत संग्रह कराया। सरकार को उम्मीद थी कि इस कदम से समाज में बराबरी आएगी और जीवन का स्तर बढ़ेगा।
Author नई दिल्ली | July 7, 2016 00:53 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतकिरण के लिए किया गया है।

स्विट्जरलैंड में हाल में हर नागरिक के बैंक खाते में 2500 स्विस फ्रैंक सालाना जमा कराने के एक प्रस्ताव पर सरकार ने जनमत संग्रह कराया। सरकार को उम्मीद थी कि इस कदम से समाज में बराबरी आएगी और जीवन का स्तर बढ़ेगा। लेकिन महत्त्व की बात है कि नागरिकों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, वे बैठे-बैठे मुफ्त में सरकारी मदद लेना नहीं चाहते। यूरोप में ही एक तरफ ग्रीस जैसे देश भी हैं जो दिवालिया होने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चेतावनी के बावजूद खर्च में कटौती को तैयार नहीं। लेकिन मैं सोचता हूं कि हम भारतीयों के लिए यह उदाहरण कितना महत्त्वपूर्ण है? हम सरकारी मदद और अनुदान पर कितने ज्यादा आश्रित हैं! छोटे से छोटा काम भी बिना सरकारी मदद के नहीं करते।
गरीबों के लिए बनी सरकारी आर्थिक मदद का फायदा लेने वालों में बहुत सारे संपन्न तबके के लोग होते हैं।

लाख रुपए से ज्यादा मासिक पगार पाने वाले भी ऊपरी कमाई के मौके तलाशते दिखते हैं। अध्यापक/प्राध्यापक प्राइवेट ट्यूशन या अन्य धंधे करते हैं, डॉक्टर अस्पताल में मरीज देखने के बजाय प्राइवेट क्लीनिक चलाते हैं, दवा कंपनी या स्वास्थ्य-जांच करने वालों से कमीशन लेते हैं। बाबू लोग फाइल खोलने या आगे खिसकाने के लिए रुपए मांगते हैं आदि-आदि। शायद हम यह मानते हैं कि बैठे-बिठाए खूब रुपए मिलने से जिंदगी आराम से बीत सकेगी, जबकि हमारी ही यह मान्यता रही है कि मेहनत का फल मीठा होता है और मेहनत की कमाई ही फलती है। यह सच भी है। जानते सब हैं, लेकिन व्यवहार में अपनाने वाले बहुत कम। सोच रहा हूं कि अगर भारत में ऐसा जनमत संग्रह कराया गया होता तो नतीजा क्या होता?

कमल जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

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