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चौपालः किसकी टीम इंडिया

भारत और पाकिस्तान के बीच अगर क्रिकेट मैच हो रहा हो तो हमारे देश के क्रिकेट-प्रेमियों की राष्ट्रीय-भावनाएं अपने चरम पर होती हैं।
Author June 23, 2017 02:56 am
भारत और पाकिस्तान के बीच अगर क्रिकेट मैच हो रहा हो तो हमारे देश के क्रिकेट-प्रेमियों की राष्ट्रीय-भावनाएं अपने चरम पर होती हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच अगर क्रिकेट मैच हो रहा हो तो हमारे देश के क्रिकेट-प्रेमियों की राष्ट्रीय-भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर भले ही वह मैच भारत की राष्ट्रीय टीम न खेलते हुए बीसीसीआई नामक एक क्रिकेट क्लब की टीम क्यों न खेल रही हो। जबकि राष्ट्रीय-भावनाओं का यह ज्वार अन्य देशों से मैच खेलते हुए क्रिकेट-प्रेमियों में बनिस्बत कमतर ही नजर आता है।  विश्व मंच पर खेलने वाली हॉकी टीम भारत की एक अधिकृत राष्ट्रीय टीम होती है। फिर भी वह अपने लिए राष्ट्रीयता की पहचान के संकट को तरसती नजर आती है। जबकि बीसीसीआई की क्रिकेट टीम देश की एक अधिकृत राष्ट्रीय टीम न होकर भी भारत के नाम से विश्व-भर में देश का प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रीयता का जलवा लूटती है। मजे की बात यह है कि बीसीसीआई नामक क्रिकेट बोर्ड अपनी टीम को भारतीय टीम के रूप में मजे से प्रचारित भी करता है और अपनी टीम से अकूत कमाई की फसल भी काटता रहता है।

दरअसल, बीसीसीआई एक कॉरपोरेट व्यवसायी की तर्ज पर राष्ट्रीयता की भावना को बड़े मजे से अपने मुनाफे के लिए दिन-रात भुनाता रहता है। मगर जब बात राष्ट्र के एक जिम्मेदार खेल संगठन होने की आती है तो वह एक स्वतंत्र और निजी खेल संगठन बन कर अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है। जबकि उसे चाहिए कि वह अपने कमाए हुए अकूत धन को देश के अन्य खेलों के विकास और प्रोत्साहन पर खर्च करे। यों देखा जाए तो देश की सरकार को खुद बीसीसीआई के अकूत धन को अन्य खेलों के विकास पर खर्च करने के लिए वाजिब कानून बनाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीयता के नाम की ख्याति पर चांदी काट रहे क्रिकेट नामक खेल के धन का न्यायसंगत इस्तेमाल हो सके!

बीसीसीआई नामक विश्व का यह सबसे धनी खेल संगठन बड़ा ही स्वयंभू आचार-व्यवहारी है। वह कई मामलों में सरकार और न्यायपालिका के आदेशों तक को चुनौती देता लगता है। लोढ़ा समिति की सिफारिशों को मानने में उसने कितने ‘किन्तु-परंतु’ प्रस्तुत किए हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। दूसरा, सूचना के अधिकार से बाहर रहने की बीसीसीआई की जिद भी एक सर्वज्ञात तथ्य है। कहने के आशय यह कि बीसीसीआई अपने धन के रसूख के चलते एक निरंकुश व्यवहार करता है। मगर उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसकी निजी हैसियत एक क्रिकेट क्लब से इतर कुछ भी नहीं है।

आज अगर उसके रंग-बिरंगे जलवे हैं भी तो सिर्फ इसलिए कि उसके क्लब का क्रिकेट देश की सरकार की मूक सहमति से राष्ट्र के नाम पर खेला जा रहा है। अगर वह अपने क्रिकेट के आयोजनों के नाम पर अथाह धन कमा पा रहा है तो इसलिए कि वह विश्व क्रिकेट में भारत के नाम पर अपने क्रिकेट क्लब का प्रतिनिधित्व करता है। आज अगर वह देश में होने वाले अपने क्रिकेट आयोजनों में जी-भर के करों की रियायतें पाता रहा है तो इसलिए कि वह देश के नाम पर अपना क्रिकेट खेलता है। मजे की बात यह है कि हमारे देश का आम क्रिकेट-प्रेमी भी इसी भ्रमित मानसिकता के कॉकटेल साथ क्रिकेट मैच देखने को अभिशप्त है। वह पाकिस्तान से मैच के मामले में एक कट्टर भारतीय समर्थक हो जाता है। जबकि अन्य देशों से मैच की स्थिति में खेल-भावना से क्रिकेट निहारने वाला एक सामान्य क्रिकेट प्रेमी हो जाता है। इसलिए ऐसे अवसरों पर उसके लिए अपनी खेल-भावना ही राष्ट्रीयता की भावना का एक भ्रमित विकल्प बनकर रह जाती है!
’राजेश सेन, इंदौर, मप्र

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