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चौपाल : हल की ओर, कैसे जनप्रतिनिधि, सच का पक्ष

मामले को शीघ्रता से सुलझाना है तो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की मध्यस्थता में दोनों पक्षों की बातचीत सर्वोत्तम मार्ग है।
Author March 25, 2017 06:14 am
प्रतीकात्मक चित्र

हल की ओर

अयोध्या विवाद के समाधान के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर के सुझाव का विरोध करने वाले लोग बड़ी गलती कर रहे हैं। मामले को शीघ्रता से सुलझाना है तो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की मध्यस्थता में दोनों पक्षों की बातचीत सर्वोत्तम मार्ग है। जो लोग तर्क दे रहे हैं कि 1991 में वार्ता का प्रयोग विफल हो चुका है, वे भूल रहे हैं कि तब कोई न्यायमूर्ति मध्यस्थ नहीं थे। उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से महज एक नौकरशाह साथ बैठा करते थे। यह बात भी याद रखनी चाहिए कि उच्चतम न्यायालय में यदि मामला चला तो सालों खिंचेगा, चाहे दोनों पक्ष कितनी भी शीघ्रता से उसे निपटाना चाहते हों।

इसका कारण पिछले मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने स्पष्ट किया था। उन्होंने कहा था कि इस मुकदमे की फाइलों में लाखों कागज हैं, जो हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अरबी, फारसी, पंजाबी (गुरुमुखी) आदि कई भाषाओं में हैं। केस प्रारंभ होने से पूर्व उन सबका सुप्रीम कोर्ट की अधिकृत भाषा अंग्रेजी में अनुवाद, और वह भी भरोसेमंद, प्रामाणिक अनुवाद जरूरी है। इस भारी भरकम काम में ही अभी कई वर्ष लगेंगे। साफ है कि तब तक वहां कुछ भी आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिए जो लोग न्यायमूर्ति खेहर के सुझाव का विरोध कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि उनकी छुपी मंशा मुकदमा लंबे समय तक लटकाना ही है, वे शीघ्र कोई निर्णय नहीं चाहते।
अजय मित्तल, मेरठ

कैसे जनप्रतिनिधि

शिवसेना सांसद रविंद्र गायकवाड के एअर इंडिया कर्मचारी की पिटाई करने का मामला इस सांसद की क्षुद्र मानसिकता को दिखाता है। इनकी गुंडई की बानगी देखिए कि कैमरे के सामने छाती ठोक कर बोल रहे थे कि हां, मैंने उस कर्मचारी को 25 बार सैंडल मारी! जनता के प्रतिनिधि के तौर पर चुने गए ये लोग अपने दिमागमें ऐसी गंदगी क्यों रखते हैं कि जहां जाएं वहां दबंगई दिखाएं! सांसद के खिलाफ मामला दर्ज हो चुका है। अब देखना होगा कि इस क्या इसके खिलाफ सचमुच कोई कार्रवाई होगी या फिर वह अपने सांसद होने का फायदा उठा कर जनता को ठेंगा दिखाएगा!
गौरव कुमार, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

सच का पक्ष

अफसोस की बात है कि आजकल हमारे शैक्षणिक संस्थान वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा बने हुए हैं और यह संघर्ष भयावह रूप लेता जा रहा है। रामजस कॉलेज विवाद में हुई हिंसा इसका ताजा उदाहरण है। हर व्यक्ति का राजनीति, समाज और आर्थिक विषयों के संदर्भ में अपना मत होता है। बेशक आप उसे दक्षिणपंथी, वामपंथी, सुधारवादी, प्रतिक्रियावादी या अन्य वैचारिक श्रेणियों में रख सकते हैं लेकिन ये सभी समाज की प्रज्ञात्मक संपत्ति हैं। हर विचारधारा के समर्थकों का प्रयास रहता है कि उनके विचारों का प्रसार हो। इसमें गलत कुछ भी नहीं है। पर जब अपने विचारों को थोपा जाता है या अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रयास किया जाता है तो समाज को इससे नुकसान पहुंचता है।

अक्सर देखा जाता है कि सत्ताधारी अपने विचारों की श्रेष्ठता साबित करने की जुर्रत में लगे रहते हैं और शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए लोगों की आवाज को दबाते हैं। ऐसा वैचारिक संघर्ष किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता है। भारतीय संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। किसी विचार का दमन करना सत्य का दमन करना है, क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि सामान्य स्वीकृत विचार सत्य हों। सत्य को हम नित्य विरोधी विचारों के संपर्क में लाकर ही जीवित रख सकते हैं क्योंकि सत्य विवाद के किसी एक पक्ष की बपौती नहीं है।
सूर्य प्रताप यादव, दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़

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