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चौपाल : इस विमानन नीति से कौन लाभान्वित होगा, यह बिल्कुल स्पष्ट है

अपनी विमानन नीति के माध्यम से मोदी सरकार ने एक बार फिर अपनी खोखली प्राथमिकताओं को उजागर करके अपने वर्गीय चरित्र का खुले तौर पर इजहार किया है।

Author नई दिल्ली | June 20, 2016 23:27 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर (File Photo)

अपनी विमानन नीति के माध्यम से मोदी सरकार ने एक बार फिर अपनी खोखली प्राथमिकताओं को उजागर करके अपने वर्गीय चरित्र का खुले तौर पर इजहार किया है। स्वीकृत विमानन नीति में क्षेत्रीय उड़ानों को प्रोत्साहन के साथ घरेलू यात्रियों की वर्तमान संख्या आठ करोड़ को वर्ष 2022 तक प्रतिवर्ष तीस करोड़ करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। तीस मिनट की यात्रा का किराया बारह सौ पचास रुपए और एक घंटे के लिए ढाई हजार रुपए रखने की बात कही गई है। इसमें र्इंधन खर्च सहित सभी तरह के टैक्स सम्मिलित होंगे। आधे घंटे या एक घंटे से अधिक की यात्रा में र्इंधन खर्च के अनुपात में किराया बढ़ेगा और उड़ान-समय की गणना उड़ान के लिए गेट बंद करने से लेकर विमान उतरने के बाद गेट खुलने के बीच की अवधि होगी। निजी विमानन कंपनियों को नुकसान की स्थिति में बीस प्रतिशत अनुदान का भी प्रावधान रखा गया है।

जब देश की अठहत्तर प्रतिशत आबादी की आय बीस रुपए प्रतिदिन से कम हो और शेष आबादी के भी बड़े हिस्से को आवास, भोजन, यात्रा, शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था में समझौता करते हुए कटौती करनी पड़ती है और गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है तो इस विमानन नीति से कौन लाभान्वित होगा, यह बिल्कुल स्पष्ट है। विदेशी उड़ानों के लिए पांच वर्ष के अनुभव की शर्त समाप्त करके बीस विमान आवश्यक किए जाने के प्रावधान से यात्री सुरक्षा के साथ भी समझौता किया गया है।

आमजन के लिए आवागमन का सबसे सुलभ साधन रेल ही है। इससे देश का बड़ा हिस्सा आज भी वंचित है और इसमें पूर्वोत्तर सहित आदिवासी और ग्रामीण अंचल का भी वृहत हिस्सा शामिल है। छत और डिब्बों के बाहर लटक कर अपनी जान जोखिम में डाल कर यात्रा करते यात्रियों के दृश्य हमें हर रोज दिखाई देते हैं। रेलविहीन क्षेत्र में रेल सुविधाओं का विस्तार, गेज कनवर्शन, रेल लाइन दोहरीकरण, विद्युतीकरण, पुरानी लाइनों का बदलाव, जर्जर पुलों का सुधार, सुरक्षा फाटक और उन्नयन के कार्यों के लिए संसाधनों के अभाव और लाभप्रदता के तर्क गढ़े जाते हैं और दबे-छिपे रूप से रेलवे के निजीकरण की कोशिशें जारी हैं, जबकि निजी विमानन कंपनियों को बीस प्रतिशत तक अनुदान देने के प्रावधान किए जा रहे हैं।

ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के लिए यातायात का दूसरा साधन बस है। लेकिन कई राज्यों द्वारा लाभप्रदता के नाम पर राज्य परिवहन निगम को बंद कर सरकारी बस सेवाओं को समाप्त कर दिया गया है तो कुछ राज्यों की सीमित सेवाएं ही जारी हैं। दूरस्थ इलाकों में तो लोग टेम्पो, जीप, ट्रक आदि से यात्रा करने को विवश हैं। निजी वाहन सेवा प्रदाता अपने एकाधिकार के चलते मनमाना किराया वसूलने, ठसाठस भरने और असम्मानजनक व्यवहार के लिए कुख्यात हैं। उस पर नियंत्रण के लिए कुछ नहीं हो रहा है।

पूरे देश के आमजन को सहज, सुलभ, सुगम, सुरक्षित और सुनिश्चित यातायात सुविधा उपलब्ध कराने के लिए रेल और बस के संजाल (नेटवर्क) की ठोस और व्यावहारिक परियोजना बना कर उसे लागू करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुलभ और वहनीय यातायात सुविधा से क्षेत्रीय विषमताओं को कम करने और देश को बदलने की रफ्तार तेज की जा सकती है। बुलेट ट्रेन या सस्ती वायुयान यात्रा जैसी प्राथमिकताएं आमजन के लिए हवा-हवाई के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं।

सुरेश उपाध्याय, इंदौर, मप्र

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First Published on June 21, 2016 12:45 am

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