December 08, 2016

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चौपाल: मजहब की दीवार

धर्म या पूजा पद्धति का कोई दिखावा भी जरूरी नहीं और एक सभ्य समाज में किसी को भी यह जानने क्यों हक दिया जाए कि कोई कैसे पूजा करता है।

Author November 23, 2016 04:14 am
भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश टीएस ठाकुर। (Source: PTI)

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने अपने उद्गार से धर्मनिरपेक्षता का सच्चा अर्थ समझा दिया है कि एक व्यक्ति का भगवान से प्रेम एक गोपनीय और पूर्णतया निजी मामला है, जिसकी परीक्षा लेने का किसी को कोई अधिकार नहीं। धर्म या पूजा पद्धति का कोई दिखावा भी जरूरी नहीं और एक सभ्य समाज में किसी को भी यह जानने क्यों हक दिया जाए कि कोई कैसे पूजा करता है। धार्मिक कट्टरवादियों के कारण जितने लोग आज तक धार्मिक उन्माद और दंगों में मरे, इतने लोग युद्धों में नहीं मरे। जरूरी नहीं कि कोई व्यक्ति अगर किसी खास देवता की जय बोलता है, तो हर कोई उसका अनुसरण करे ही। हर किसी को अधिकार है कि वह किसके प्रति आस्था रखे। कोई विशेष देवता की विचारधारा वाला सत्ता पर कब्जा कर उस देवता की पूजा थोपे तो यह सांप्रदायिक हिंसा का कारण बन सकता है। सत्ताधारियों ने धर्म का एक राजनीतिक पार्टी की तरह इस्तेमाल किया और कइयों ने सम्राज्यवाद का प्रचार-प्रसार भी धर्म की आड़ में किया है।
’पीसी विश्वकर्मा, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

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First Published on November 23, 2016 4:11 am

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